254 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ये मांगें इस प्रकार थीं-
(1) भावी संविधान का स्वरूप संघीय हो जिससे अवशिष्ट शत्तिQयाँ प्रांतों के पास
हों।
(2) सभी प्रान्तों के लिए स्वायत्तता की एकरूप व्यवस्था स्वीकृत हो। (3) किसी भी प्रांत के बहुसंख्यक समुदाय को अल्पसंख्यक या समसंख्यक में
बदले बगैर, देश के सभी विधान-मंडलों और निर्वाचित संस्थाओं का पुनर्गठन
इस सिद्धांत पर किया जाना चाहिए कि अल्पसंख्यकों को प्रभावी और पर्याप्त
प्रतिनिधित्व प्राप्त हो।
(4) केन्द्रीय विधायिका में मुस्लिम प्रतिनिधित्व एक तिहाई से कम नहीं होना चाहिए। (5) अलग निर्वाचक-मण्डल के आधार पर साम्प्रदायिक वर्गों का प्रतिनिधित्व वर्तमान
की तरह ही जारी रहना चाहिए, परंतु किसी भी सम्प्रदायक को किसी भी
समय संयुत्तQ निर्वाचक-मंडल के पक्ष में अलग निर्वाचन-मंडल को तिलांजलि
देने का अधिकार भी होना चाहिए।
(6) किसी भी समय यदि प्रदेशीय-भूभाग के पुनर्निर्धरण की आवश्यकता पड़ जाती
है, जब इसका प्रभाव, बंगाल, और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में मुस्लिम बहुमत
पर नहीं पड़ना चाहिए।
(7) संपूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता का, जिसमें विश्वास, पूजा, पूजा के अनुष्ठान, प्रचार,
संगठन बनाने, तथा शिक्षा के अधिकार समाहित हैं, सभी सम्प्रदायों को वचन
दिया जाए।
(8) कोई विधेयक या संकल्प, अथवा उसका अंश तब तक किसी भी विधायिका
अथवा अन्य निर्वाचित संस्था द्वारा पारित नहीं किया जाना चाहिए जब तक
उत्तQ विधायिका अथवा निर्वाचित संस्था में किसी सम्प्रदाय के तीन चौथाई
प्रतिनिधि उसका विरोध करें तथा यह विरोध इस आधार पर किया गया हो कि
उनके सम्प्रदाय के लिए यह हानिकारक होगा। विकल्पस्वरूप ऐसे दूसरे तरीके
निकाले जा सकते हैं जो ऐसे मामलों का निष्पादन करने के लिए व्यावहारिक
और सक्षम हों।
(9) बम्बई पे्रजि़डेन्सी से सिंध को अलग कर दिया जाना चाहिए। (10) उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश तथा बलूचिस्तान में सुधार अन्य प्रांतों के स्तर पर
ही लागू किया जाना चाहिए।