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एक राष्ट्र का अपने घर के लिए आह्वान

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तरह की संचेतना से है, जातीय बंधन के अस्तित्व के प्रति सजगता से है। राष्ट्रवाद से तात्पर्य है फ्उन लोगों के लिए एक पृथक राष्ट्रीय अस्तित्व की आकांक्षा, जो इस जातीय बंधन में बंधे हैं।य् दूसरी यह कि यह सही है कि राष्ट्रीयता की भावना के बिना राष्ट्रवाद हो ही नहीं सकता। परंतु इस बात को भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीयता की भावना की मौजूदगी के बावजूद राष्ट्रवाद की सोच सर्वथा अनुपस्थित हो सकती है। कहने का तात्पर्य यह है कि राष्ट्रीयता से राष्ट्रवाद उजागर होने के लिए दो शर्तें आवश्यक हैं। प्रथम, एक राष्ट्र के रूप में रहने की इच्छा का जाग्रत होना, दूसरी, एक क्षेत्र का होना जिसे राष्ट्रवाद अधिगृहीत कर एक राज्य तथा राष्ट्र का सांस्कृतिक घर बना सके। ऐसे क्षेत्र के अभाव में क्या होगा, इसे स्पष्ट करने के लिए लॉर्ड ऐक्टन की इस उक्ति का उपयोग करना होगा कि फ्आत्मा एक ऐसे शरीर की खोज में भटकती है जिसमें वह पुनः जीवन का संचार करे, परंतु उसे न पाने पर वह मर जाती है।य् मुसलमानों ने एक राष्ट्र के रूप में रहने की इच्छा विकसित की है। उनके लिए प्रकृति ने एक ऐसा क्षेत्र तलाश लिया है जिसे अधिगृहीत कर वे नवजात मुस्लिम राष्ट्र का सांस्कृतिक गृह और राज्य बना सकते हैं। इन अनुकूल परिस्थितियों में यदि मुसलमान यह कहते हैं कि वे ऐसी स्थिति अपनाने में संतुष्ट नहीं हैं जिसे कनाडा में फ्रांसीसियों ने अपनाया है अथवा दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों ने अपनाया है, और वे अपना एक राष्ट्रीय गृह चाहते हैं जिसे वे स्वयं का अपना कह सकें, तो उनके ऐसा कहने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए।