20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
उपलब्ध नहीं है। जैसा कि प्रो. टोयेन्बी ने भी कहा हैः
फ्राष्ट्रीयता के अस्तित्व के लिए एक अथवा ऐसे अनेक मदों की मौजूदगी
को एक ठोस दलील के तौर पर पेश करना असंभव तर्क देने के समान
है। हो सकता है कि वे युगों से रहे हों और कोई प्रतिक्रिया नहीं हो पाई
हो। किंतु एक मामले को दूसरे में बतौर तर्क इस्तेमाल करना असंभव है।
क्योंकि मदों का वही समूह यहां राष्ट्रीयता का नियामक भी बन सकता है,
जो वहां निष्प्रभावी रहा हो।य्
ऐसा सम्भवतः इस तथ्य के कारण है जिसकी ओर प्रो. बार्कर ने इशारा किया है। उनका कहना है कि यह संभव है कि राष्ट्र शताब्दियों से अस्तित्व में रहते हुए भी एक अदृश्य-सा मौन धारण किए रहें, हालांकि उनमें राष्ट्र जीवन का वह आध्यात्मिक सार विद्यमान हो जिससे उसके सदस्य अवगत नहीं हैं। इसी तरह की कोई बात मुसलमानों के मामले में भी निस्संदेह हुई है। वे इस तथ्य से अवगत नहीं थे कि उनमें राष्ट्रीय जीवन का आध्यात्मिक सार विद्यमान है। इसी से यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने अपने एक राष्ट्र होने का दावा इतने विलंब से पेश किया है। परंतु इसका यह अर्थ तो नहीं हो सकता कि राष्ट्रीय जीवन का आध्यात्मिक सार अस्तित्व में था ही नहीं।
यह कहना निरर्थक है कि ऐसे मामले भी हैं जिनमें राष्ट्रीयता का बोध तो रहता है, परंतु पृथक राष्ट्रीय अस्तित्व की आकांक्षा नहीं होती। कनाडा में फ्रांसीसियों और दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों का उदाहरण इस तरह के मामलों में दिया जा सकता है। यह स्वीकार करना ही होगा कि कुछ ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जहां लोग अपनी राष्ट्रीयता से अवगत रहे हैं, परंतु उनकी इस सजगता ने भी उनमें वह आवेग पैदा नहीं किया, जिसे राष्ट्रवाद कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, राष्ट्रवाद से अनुप्राणित हुए बिना भी राष्ट्रों जैसी चेतना विद्यमान हो सकती है। इसी दलील के आधार पर यह तर्क दिया जा सकता है कि मुसलमान यह सोच तो सकते हैं कि वे एक राष्ट्र हैं, परंतु उन्हें उसी कारण एक पृथक राष्ट्रीय अस्तित्व की मांग उठाने की जरूरत नहीं है, वे वैसे ही स्थिति से संतुष्ट क्यों नहीं हो सकते जो कनाडा में फ्रांसीसियों और दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों को प्राप्त है, ऐसी स्थिति तो काफी मजबूत स्थिति है। मगर यह भी स्मरण रखना चाहिए कि ऐसी स्थिति मुसलमानों से विभाजन पर जोर देने का आग्रह करके अपनाई जा सकती है। यदि वे विभाजन पर जोर ही दें, तो उनके दावे के विरुद्ध यह कोई दलील नहीं हो सकती।
कहीं यह दलील नकारने का भ्रम पैदा न कर दे, इसलिए दो बातों की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। पहली यह कि राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद में फर्क है। ये मानव मस्तिष्क की दो अलग-अलग मनोवैज्ञानिक अवस्थाएं हैं। राष्ट्रीयता से तात्पर्य एक