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अध्यायः 3
अधःपतन से मुक्ति
फ्भारत के विभाजन और पृथक मुस्लिम राज्यों की स्थापना के लिए भारतीय मुसलमानों द्वारा की जा रही मांग का औचित्य क्या है? यह विद्रोह क्यों है और शिकायत क्या है?य् स्वाभाविक आक्रोश से हिंदू ये प्रश्न उठाते हैं।
जिस किसी को इतिहास का ज्ञान है, उसे यह अनुभूति हुए बिना नहीं रहेगी कि अब यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि राष्ट्रवाद राष्ट्रीय राज्य के निर्माण हेतु समुचित तर्कसंगत आधार है जैसा कि महान इतिहासकार लॉर्ड एक्टन ने कहा है-
फ्पुरानी यूरोपियन व्यवस्था में सरकारों ने न तो राष्ट्रीयता के अधिकारों को
मान्यता दी थी और न लोगों ने ही इस पर जोर दिया था। सीमाओं का
नियमन शासक परिवारों के हित थे, न कि राष्ट्रों के, और प्रशासन का
संचालन भी जनाकांक्षाओं की परवाह किए बिना ही होता था। जहां सभी
तरह की स्वतंत्रता का दमन किया जाता था, वहां राष्ट्रीय स्वतंत्रता की
अपेक्षा होना तो अनिवार्य था ही_ और फेनेलोन के शब्दों में, एक राजकुमारी
अपने विवाह के भाग (दहेज) स्वरूप राजतंत्र को भी अपने साथ लाती
थी।य्
पहले-पहल राष्ट्रीयताएं किसी सूची में ही नहीं थीं। फिर जब उनमें (लोगों में) चेतना का सृजन हुआ तोः
फ्सर्वप्रथम वे अपने वैध शासकों की रक्षा के लिए विजेताओं के विरुद्ध खड़े
हो गए। उन्होंने सत्ता हड़पने वाले विजेताओं द्वारा शासित होने से इंकार कर
दिया। उसके बाद ऐसा समय आया जब उन्होंने शासकों द्वारा अपने ऊपर
किए गए अन्यायों के विरुद्ध विद्रोह किया। इन विद्रोहों को उन विशिष्ट
शिकायतों ने बढ़ावा दिया जिनका सुनिश्चित और न्यायसंगत आधार था।
उसके बाद फ्रांस की क्रांति ने आमूलचूल परिवर्तन ही ला दिया। उसने लोगों
को यह सिखाया कि वे जो कुछ भी करना चाहते हैं, उस सब को करने
के अपने अधिकार का सर्वोच्च मानदंड अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं को