24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
बनाएं। इसने जनता की उस सार्वभौमिकता का आह्वान किया जो अतीत
से भी अनियंत्रित थी और मौजूद राज्य से भी नियंत्रित नहीं थी। फ्रांसीसी
क्रांति की यह शिक्षा सभी उदारवादी विचारकों के लिए एक मान्य सिद्धांत
बन गई। मिल ने उसका समर्थन किया। मिल ने कहा कि शायद ही किसी
को पता हो कि मानव जाति के किसी भाग को आचरण की छूट हो, भले
ही उन्हें यह तय करने की छूट हो कि मानव के विभिन्न सामूहिक संगठनों
में से वे खुद को किससे जोड़ना चाहते हैं।य्
उन्होंने यहां तक कहा किः
फ्सामान्यतः स्वतंत्र संस्थानों के लिए यह एक आवश्यक शर्त है कि सरकारों
की सीमाएं राष्ट्रीयताओं के आधार के अनुरूप होनी चाहिए।य्
इस प्रकार, इतिहास यह दर्शाता है कि राष्ट्रीयता का सिद्धांत जनाकांक्षा की प्रभुसत्ता के लोकतांत्रिक सिद्धांत में अंतर्भूत है। इसका तात्पर्य यह है कि किसी राष्ट्रीयता द्वारा राष्ट्रीय राज्य की मांग के पीछे शिकायतों का होना जरूरी नहीं है। जन-आकांक्षा ही उसे न्यायसंगत सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।
किंतु यदि मुसलमान अपने दावे के समर्थन में शिकायतों का उल्लेख करना आवश्यक समझते हैं तो इन्हें सार-रूप में इस एक वाक्य में समाहित किया जा सकता है कि संवैधानिक संरक्षण उन्हें हिंदू बहुसंख्यकों के अत्याचार से बचाने में असफल रहे हैं।
गोलमेज सम्मेलन में मुसलमानों ने अपने उन संरक्षणों की सूची पेश की थी जिनको बहुचर्चित चौदह सुत्रों के तहत समाहित किया गया था। गोलमेज सम्मेलन में हिंदू प्रतिनिधियों ने उन्हें नहीं माना, अतएव गतिरोध उत्पन्न हो गया। ब्रिटिश सरकार ने हस्तक्षेप कर एक फैसला दिया, जिसे ‘सांप्रदायिक निर्णय’ (कम्यूनल अवार्ड) कहा जाता है। इस फैसले में मुसलमानों के सभी चौदह सूत्र मान लिए गए। सांप्रदायिक निर्णय को लेकर हिंदुओं में प्रबल कटुता पैदा हो गई। उसमें कांग्रेस सहभागी नहीं बनी, यद्यपि उसने इस निर्णय को राष्ट्र विरोधी बताने तथा मुसलमानों की सहमति से इसे परिवर्तित कराने का अपना अधिकार कायम रखा। मुसलमानों की भावनाओं को आघात नहीं लगने देने को लेकर कांग्रेस इतनी अधिक सतर्क थी कि जब केंद्रीय असेंबली में सांप्रदायिक निर्णय की भर्त्सना का प्रस्ताव पेश हुआ तो कांग्रेस ने उसका समर्थन तो नहीं किया, किंतु उसका विरोध भी नहीं किया और वह तटस्थ रही। मुसलमानों का कांग्रेस के इस रवैए को मैत्रीपूर्ण मानना उचित ही था।
हिंदू बहुल प्रांतों में कांग्रेस को चुनावों में मिली विजय से मुसलमानों की शान्ति में कोई व्यवधान उपस्थित नहीं हुआ। उन्होंने महसूस किया कि कांग्रेस से भयभीत