भागः V
पाकिस्तान के सवाल पर पूर्ववर्ती पृष्ठों में जो भी कहा गया है, उसके बारे में भिन्न-भिन्न लोगों के अलग-अलग विचार हैं। कुछ लोगों ने आरोप लगाया है कि मैंने इस समस्या के केवल दो पहलुओं पर चर्चा की है और अपना व्यक्तिगत विचार व्यक्त नहीं किया। यह बात सही नहीं है। जिसने भी पूर्ववर्ती खंड़ों को पढ़ा है, वह इस बात से सहमत होगा कि मैंने सब पहलुओं पर भले ही अपने विचार व्यक्त न किए हों, तब भी अनेक समस्याओं के बारे में अपनी स्पष्ट राय दी है। इस संदर्भ में मैं विशेष रूप से दो महत्वपूर्ण विवादग्रस्त बातों का उल्लेख करना चाहता हूं। क्या मुसलमान समुदाय कोई राष्ट्र है, और क्या पाकिस्तान के लिए उनका कोई हक बनता है? कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं, जिनकी आलोचना इससे भिन्न है। उन्हें इस प्रकार की कोई शिकायत नहीं है कि मैं अपना दृष्टिकोण रखने में असफल रहा हूं। उनकी शिकायत यह है कि अपने निष्कर्षों पर पहुंचने में मैंने जिन कथनों को आधार बनाया है वे इस प्रकार के हैं कि मानो वे सब अपने आप में बिलकुल सही थे और उनमें मैंने किसी अपवाद को स्वीकार नहीं किया। मुझसे पूछा गया है कि क्या आपने अपने निष्कर्षों को अत्यंत सामान्य ढंग से नहीं रखा है? क्या कोई सामान्य कथन ऐसा नहीं है जिस पर शर्तों और सीमाओं का अंकुश न हो? क्या आपने कतिपय गहन समस्याओं का समाधान किसी अश्वारोही की तरह संक्षेप में नहीं किया है? क्या आपने बताया कि किस प्रकार न्यायोचित एवं शांतिपूर्ण ढंग से पाकिस्तान अस्तित्व में आ सकता है? परन्तु यह आलोचना भी पूर्णतया सही नहीं है।
यह कहना सही नहीं है कि मैंने उपर्युक्त बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया? हो सकता है कि इन पर मेरी चर्चा संक्षिप्त एवं छुटपुट रही हो, तथापि मैं इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार हूं कि इस आलोचना में काफी दम है और इस दोष को दूर करना मेरा कर्तव्य है। अतः इस भाग में निम्नलिखित विषयों पर विचार किया गया हैः