350 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
आधार उत्पन्न किया जा सकता है। यहां तक कि उनके बीच उपयुत्तQ भौतिक संबंध भी नहीं हैं, सामान्य सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंधों की तो बात ही क्या है। वे साथ-साथ नहीं रहते। हिंदू और मुसलमान दोनों ही अपनी अलग-अलग दुनिया में रहते हैं। उन प्रांतों में जहां हिंदू बहुसंख्या में हैं, वहां वे गांवों में रहते हैं, और मुसलमान शहरों में। जहां कहीं भी वे रहते हैं, प्रायः अलग-अलग ही रहते हैं। प्रत्येक गांव और कस्बे में हिंदुओं और मुसलमानों की पृथक-पृथक बस्तियां हैं, जो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। उनके बीच में सहभागिता के लिए कोई समान आधार नहीं है। वे या तो व्यापार के लिए मिलते हैं अथवा खून-खराबे व हत्या करने के लिए, पर एक-दूसरे से दोस्ती के लिए कभी नहीं मिलते। जब कि शांति काल में हिंदू और मुस्लिम बस्तियां ऐसी लगती हैं, जैसे दो विदेशी बस्तियां हों, लेकिन जिस क्षण युद्ध घोषित होता है, तो ये बस्तियां सशस्त्र छावनियां लगने लगती हैं। शांति और युद्ध के बीच के अंतराल में, जो प्रायः छोटा होता है, लगातार तनाव बना रहता है। ऐसी अड़चनों में जनसंपर्क-अभियान क्या कर सकता है? आंगिक एकता की बात तो दूर, ऐसी स्थिति में जनसंपर्क-अभियान अड़चनों के उस पार भी नहीं जा सकता।