12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 362

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अध्यायः 13

क्या पाकिस्तान बनना चाहिए?

I

इससे पूर्व जो कुछ कहा गया है, उसके बारे में कोई भी शंकालु, राष्ट्रवादी, रूढि़वादी और प्राचीन विचारों का भारतीय यह प्रश्न अवश्य पूछेगा-फ्क्या पाकिस्तान बनना चाहिए?य् इस प्रकार की प्रवृत्ति को कोई तुच्छ नहीं कह सकता है चूंकि पाकिस्तान की समस्या वास्तव में बड़ी गंभीर है, और यह बात मान लेनी चाहिए कि मुसलमानों तथा उनके पक्षधरों से उक्त प्रश्न के विषय में सवाल करना केवल प्रासंगिक एवं सही ही नहीं, महत्वपूर्ण भी है। इस बात का महत्व एवं आवश्यकता इस तथ्य में निहित है कि पाकिस्तान के पक्ष को क्षीण करने वाली सीमाएं इतनी अधिक हैं कि आसानी से उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। उक्त सीमाओं के बारे में कोई भी एक वक्तव्य से ही यह समझ सकता है कि उनमें कितना दम है। यह बात उनकी आकृति से ही स्पष्ट झलकती है। ऐसा होते हुए पाकिस्तान के औचित्य को प्रमाणित करने का दायित्व मुसलमानों पर अधिक है। वस्तुतः पाकिस्तान का विषय, अथवा दूसरे शब्दों में भारत का विभाजन, इतना गंभीर मामला है कि मुसलमानों को केवल इसे प्रमाणित करने का दायित्व ही नहीं लेना होगा बल्कि उन्हें ऐसा साक्ष्य भी देना पड़ेगा जो अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के जमीर को संतुष्ट कर सके, जिससे वे अपना मामला जीत सकें। अब देखते हैं कि उक्त सीमाओं के परिपे्रक्ष्य में पाकिस्तान का मामला किस प्रकार ठहरता है?

II

क्या पाकिस्तान का बनना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि मुस्लिम जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा कुछ निश्चित क्षेत्रों में केंद्रित है जिन्हें सरलता से भारत से अलग किया जा सकता है? इसमें तो कोई दो मत नहीं हैं कि मुस्लिम जनसंख्या कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में केन्द्रित है जिनका अलग किया जाना संभव है। परंतु इससे क्या? इस प्रश्न को समझने एवं इस पर विचार करने के लिए हमें इस मौलिक तथ्य को नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति ने भारत को एक एकल भौगोलिक इकाई के रूप में निर्मित किया