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358 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

लोग बोलचाल में उसका उपयोग करते हैं। अनेक लोगों ने इसकी जानकारी

और ज्ञान के बावजूद इसका खुला उल्लंघन किया है और बहुसंख्यक लोगों

ने सहिष्णुता की कमी के कारण इसके प्रति नाराजगी जताई है या इसका

मजाक उड़ाया है।य्

इसी मुद्दे पर एक दूसरे साक्षी की बात पर भी गौर किया जा सकता है। वे हैं मैंनफ्रेड नाथनऽ। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में बोअर्स और अंगे्रजों के बीच जो संबंध हैं, उसके बारे में कहा है -

फ्हो सकता है वे दोनों प्रोटेस्टेंट हों, यद्यपि आजकल इसका कोई महत्व नहीं

रह गया है। धार्मिक मतभेद अब कोई ज्यादा माने नहीं रखता। वे एक-दूसरे

के साथ खुले आम वाणिज्यिक लेन-देन करते हैं।य्

* * *

फ्इसके बावजूद, इस बात में सच्चाई नहीं है कि गोरे लोगों की

आबादी के इन दो समुदायों के बीच पूर्ण रूप से उन्मुक्त सामाजिक व्यवहार

होता है। कहा जाता है कि इसका एक कारण यह है कि बड़े शहरी केंद्रों

में अंगे्रजी भाषी लोगों की आबादी अधिक है और शहरी लोगों को देहातों में

रहने वालों के रहन-सहन के बारे में बहुत कम जानकारी होती है। लेकिन

देहाती कस्बों में भी यद्यपि आमतौर पर काफी मैत्री होती है और बोअर्स

लोग अपने यहां आने वालों का काफी सम्मान करते हैं तथापि आवश्यक

व्यवसाय अथवा वाणिज्यिक संबंधों को छोड़कर, दोनों समुदायों के बीच

सामाजिक संबंध अधिक नहीं है और धर्मार्थ अथवा सार्वजनिक सामाजिक

कामों में सहयोग की जो अपेक्षा की जाती है, वह उनमें प्रायः नहीं है।य्

भारत ही एक ऐसा देश नहीं है जहां सांप्रदायिक संघर्ष होते हैं। कनाडा और दक्षिण अफ्रीका में भी यह स्थिति विद्यमान है। यदि कनाडा में सांप्रदायिक तनातनी के होते हुए फ्रेंच और अंगे्रज राजनीतिक इकाई के रूप में रह सकते हैं, दक्षिण अफ्रीका में यह सांप्रदायिक तनातनी अंगे्रजों और डचों को राजनीतिक इकाई में बांधे रहने में कोई बाधा नहीं पहुंचाती, और यदि इस सांप्रदायिक तनातनी के बावजूद स्विटज़रलैंड में फ्रेंच और इटालियंस जर्मनों के साथ राजनीतिक इकाई के रूप में रह सकते हैं, तो भारत में हिंदू और मुस्लिम एक संविधान के अंतर्गत क्यों नहीं रह सकते?

ऽ दि साउथ अफ्रीका कॉमनवैल्थ, पृष्ठ-365