अधःपतन से मुक्ति
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गंवा बैठी। इनके साथ ही साथ सिंध और अवध के अधिग्रहण तथा विद्रोह के कारण भी उन पर प्रचंड प्रहार हुए। इनमें से अंतिम ने तो मुसलमानों के उन उच्च वर्गों को विशेष रूप से प्रभावित किया जिन्हें गदन में उनकी संदिग्ध लिप्तता के कारण दंडित करते हुए ब्रिटिश सत्ता ने व्यापक रूप से उनकी संपत्ति को जब्त कर लिया गया। गदर की समाप्ति के साथ ही साथ मुसलमानों और उनके गौरव को चाहे वे उच्च वर्ग के थे या निम्न वर्ग के, इन घटनाओं ने गहरे तक आहत किया। उनमें निराशा बढ़ी तथा निर्धनता ही उनका प्रारब्ध बन गई। प्रतिष्ठा, शिक्षा और संसाधनों से वंचित मुसलमानों को हिंदुओं का सामना करने के लिए छोड़ दिया गया। ब्रिटिश सत्ता ने तटस्थता का दावा किया था और वह दोनों समुदायों के बीच संघर्ष के परिणाम से भी उदासीन रही। नतीजा यह हुआ कि मुसलमान संघर्ष में पूर्णतः पिछड़ गए। भारत पर ब्रिटिश विजय ने दोनों समुदायों की सापेक्ष स्थिति में एक पूर्ण राजनीतिक क्रांति ही ला दी। मुसलमानों ने छह सौ वर्षों तक हिंदुओं पर हुकूमत की थी। ब्रिटिश सत्ता के आने से वे भी हिंदुओं के स्तर पर ही धकिया दिए गए। मालिकों से वे सहयोगी प्रजाजन बना दिए गए। यह पराभव ही बहुत था, किंतु सहयोगी प्रजाजनों की अपेक्षा हिंदुओं की प्रजा बन जाना तो निश्चय ही अपमानजनक है। मुसलमान पूछते हैं कि क्या यह अस्वाभाविक है यदि वे इस विषम स्थिति से बचने के लिए एक पृथक राष्ट्र की स्थापना की मांग करते हैं, जिसमें मुसलमान एक शांतिपूर्ण गृह प्राप्त कर सकें और जिसमें शासक जाति और शासित जाति के बीच के तनावों द्वारा उनकी जिंदगी को मुसीबत में डालने की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी।