3. अधःपतन से मुक्ति - Page 39

30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

वह है अल्पसंख्यक समुदायों के प्रभावी प्रतिनिधियों को सत्ता में भागीदारी देने की सहमति। क्या कांग्रेस इसके लिए तैयार है? प्रत्येक व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर जानता है। कांग्रेस किसी समुदाय के किसी ऐसे सदस्य के साथ सत्ता में हिस्सेदारी को तैयार नहीं है जो कांग्रेस के प्रति निष्ठावान हो। कांग्रेस के प्रति निष्ठा सत्ता में भागीदारी की पूर्व शर्त है। कांग्रेस का यही नियम प्रतीत होता है कि यदि कोई समुदाय कांग्रेस के प्रति निष्ठावान नहीं है, तो उसे राजनीतिक सत्ता से परे रखा जाए।

राजनीतिक सत्ता में शामिल नहीं किया जाना ही सत्तारूढ़ जाति और शासित जाति के बीच अंतर का सार है, और जब तक कांग्रेस इस सिद्धांत को कायम रखेगी, तब तक यही कहा जाएगा कि कांग्रेस जब गद्दी पर थी तो भी उसने इसी तरह का भेदभाव बरता था। मुसलमानों को यह शिकायत हो सकती है कि उन्होंने काफी कष्ट भोग लिया है और इस तरह उन्हें शासित जाति की स्थिति में पहुंचा दिया जाना अंतिम प्रहार की लोकोक्ति को ही साकार करना है। देश पर ब्रिटिश अधिकार के साथ ही साथ भारत में उनका पराभव और पतन शुरू हो गया था। अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए प्रत्येक व्यवस्थापन, प्रशासनिक अथवा कानूनी परिवर्तन, से मुस्लिम समुदाय पर अनेक प्रहार हुए हैं। भारत के मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं को अपने कानून और नागरिक मामलों में अपनी प्रणाली कायम रखने की अनुमति दी थी। ब्रिटिश शासन ने जो पहला काम किया वह यह है कि उसने शनैः शनैः हिंदू फौजदारी कानून समाप्त किया और मुस्लिम फौजदारी कानून बनाया, जिसे हिंदुओं और मुसलमानों पर लागू किया। और फिर धीरे-धीरे मुस्लिम फौजदारी कानून के स्थान पर मैकाले की दंड-संहिता लागू करके अपने ही कानून थोप दिए।

मुस्लिम समुदाय की हैसियत और गौरव पर यह पहला आघात था। इसके बाद शरीयत अथवा मुस्लिम नागरिक कानून के क्षेत्राधिकार को घटाया गया। इसका क्रियान्वयन व्यक्तिगत संबंधों से संबंधित मामलों, जैसे विवाह और उत्तराधिकार तक ही सीमित कर दिया, और वह भी उसी हद तक जिसकी ब्रिटिश अनुमति दें। इसके साथ ही साथ, 1837 में फारसी भाषा को, जो अदालतों और सामान्य प्रशासन की सरकारी भाषा थी, समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर अंग्रेजी और देशी भाषाओं को लागू किया गया। उसके बाद काजी हटाए गए, जो मुस्लिम शासन के दौरान शरीयत को लागू करते थे। उनके स्थान पर विधि-अधिकारी और न्यायाधीश नियुक्त किए गए, जो किसी भी धर्म के मानने वाले हो सकते हैं परंतु उन्हें मुस्लिम कानून की व्याख्या करने का अधिकार प्राप्त हो गया और उनके फैसलों को मानने के लिए मुसलमानों को बाध्य कर दिया गया। मुसलमानों को लगे ये प्रबल आघात थे। परिणामतः मुसलमानों को यह प्रतीत हुआ कि वे प्रतिष्ठा से वंचित हो गए, उनके कानून हटा दिए गए, उनकी भाषा त्याग दी गई और उनकी शिक्षा अपना वित्तीय महत्व