422 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
संप्रदाय संबंधी पंचाट के फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार के प्रति घृणा-भावना उत्पन्न हो गई है। यह एक कृतर्तिंपूर्ण कार्य रहा है और ब्रिटिश सरकार को इससे मुक्त होने में प्रसन्न होना चाहिए। ऐसी कतिपय जातियां हैं जिनके संबंध में ब्रिटिश सरकार अपने को स्वतः ट्रस्टी समझती है और जिनकी सुरक्षा और संरक्षण के लिए पर्याप्त व्यवस्था करती है। वे लोग अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थ मंडल द्वारा उनके हितों की सुरक्षा का संविधान में उल्लेख करने से अधिक और क्या अपेक्षा कर सकते हैं? उक्त मध्यस्थ मंडल के निर्णय को कार्यान्वित करने में एक ही संदिग्धता है, जिसके फलस्वरूप कुछ कठिनाई उत्पन्न हो सकती है। वह संदिग्धता इस प्रकार की है कि यदि वादग्रस्त पार्टियों में से कोई भी एक अपना मामला उक्त मध्यस्थ मंडल के सम्मुख प्रस्तुत नहीं करती तो इस स्थिति में सवाल यह होगा कि क्या ऐसी पार्टी के विरुद्ध निर्णय को लागू करने में ब्रिटिश सरकार सही होगी? मुझे यह कहते हुए कोई कठिनाई नहीं है कि ब्रिटिश सरकार ऐसी पार्टी के विरुद्ध उक्त निर्णय को कार्यान्वित कर सकती है। जो पार्टी अपना मामला उक्त मध्यस्थ मंडल के समक्ष रखने करने का निषेध करती है, उसकी क्या स्थिति है? इसका उत्तर यह है कि ऐसी पार्टी आक्रामक होगी। झगड़े में पहल करने वाले के साथ कैसा व्यवहार किया जाए? उसे अधिकृत आज्ञाओं के पालन के लिए बाध्य करना होगा। एक पार्टी के विरुद्ध जो मध्यस्थ मंडल के सम्मुख नहीं जाना चाहती, मध्यस्थ मंडल के निर्णय को लागू करने का मतलब आक्रामक पार्टी के विरुद्ध आज्ञापत्र को लागू करने की कार्यवाही है। ब्रिटिश सरकार को इसमें परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि इस प्रकार के मामलों को तय करने के लिए यह एक उत्तम, प्रमाणित एवं मान्यता-प्राप्त ढंग है और लीग ऑफ नेशंस की इस पर मुहर है। उसने यह फार्मूला उस समय निकाला था जब मुसोलिनी ने अबीसीनिया के साथ अपने झगड़े की मध्यस्थता के समय इसका निषेध किया था। पर जो कुछ मैंने प्रस्तावित किया है, उसके बाद क्या? इस प्रश्न का उत्तर मैं नहीं जानता कि इसके अलावा और क्या किया जा सकता है। जो कुछ मैं जानता हूं वह यही है कि उत्तर दिए बिना भारत में स्वतंत्रता नहीं होगी। इसलिए यह निर्णयात्मक होना चाहिए, तुरंत होना चाहिए, और संबंधित पार्टियों के लिए संतोषप्रद होना चाहिए।