परिशिष्ट - 18
महामहिम की सरकार द्वारा दिया गया
सांप्रदायिक पंचाट ख्1, -1932
गोलमेज सम्मेलन के दूसरे सत्र की समाप्ति पर महामहिम की सरकार की ओर से प्रधानमंत्री द्वारा गत 1 दिसंबर को दिए गए वक्तव्य में_ जिसका संसद की दोनों सभाओं के तत्काल बाद समर्थन किया था, यह स्पष्ट कर दिया गया था कि यदि भारत के संप्रदाय सभी दलों को स्वीकार्य सांप्रदायिक प्रश्नों के किसी समझौते पर पहुंचने में असफल होते हैं, जिसे सम्मेलन भी हटा नहीं सका, तो महामहिम की सरकार का यह दृढ़ निश्चय है कि इस कारण से भारत के संविधान-निर्माण के कार्य को बाधित नहीं होने दिया जाए और वे स्वयं एक अंतिम योजना तैयार करके और उसे लागू करके इस बाधा को दूर कर देंगे।
यह जानकारी मिलने पर कि संप्रदायों द्वारा किसी समझौते पर पहुंचने में निरंतर असफल रहने के कारण नया संविधान बनाने की योजना की प्रगति बाधित हो रही थी, महामहिम की सरकार ने गत 19 मार्च को कहा कि वे इस संबंध में उद्भूत कठिन और विवादस्पद प्रश्नों की सावधानीपूर्वक पुनः जांच में लगे थे। अब वे संतुष्ट हैं कि संविधान के अंतर्गत अल्पसंख्यकों की स्थिति संबंधी समस्याओं के कम से कम कुछ पहलुओं पर किसी निर्णय के बिना, संविधान निर्माण के कार्य में प्रगति नहीं हो सकती।
महामहिम की सरकार ने तद्नुसार यह निर्णय लिया है कि वे भारतीय संविधान से संबंधित प्रस्तावों में नीचे दी गई योजना को कार्य रूप देने के प्रावधानों को सम्मिलित करेंगे, जिसे यथासमय संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। इस योजना के विस्तार को जानबूझकर प्रांतीय विधानमंडल में ब्रिटिश भारतीय संप्रदायों के प्रतिनिधित्व के लिए की जाने वाली व्यवस्था तक सीमित रखा गया है और केंद्र में विधानमंडल में प्रतिनिधित्व पर विचार को नीचे पैरा-20 में दिए गए कारण से आस्थगित किया जा रहा है। इस योजना के विस्तार को सीमित रखने का निर्णय लिए जाने का अभिपे्रत यह समझने की असफलता नहीं है कि संविधान-निर्माण के लिए अल्पसंख्यकों के अधिक महत्व वाली अनेक समस्याओं का निर्णय करना आवश्यक होगा, बल्कि इस आशा से लिया गया है कि प्रतिनिधित्व की विधि और अनुपात के मूल प्रश्न पर एक बार घोषणा कर दिए जाने पर संप्रदायों के लिए स्वयं अन्य उन सांप्रदायिक समस्याओं के संबंध में किसी अस्थायी समझौते पर पहुंचना संभव हो सके, जिन पर अभी तक
संसदीय प्रलेख (कमांड 4147) - 1932 शासकीय रूप से इसे सांप्रदायिक निर्णय कहा जाता है।