परिशिष्ट - Page 471

462 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

हल ढूंढने के लिए अधिक ब्यौरे में जाने से बचना असंभव पाया। फिर भी, निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण किया जाना शेष है। वे विहित करते हैं कि इस कार्य को भारत में यथासंभव शीघ्र आरंभ किया जाना चाहिए।

संभव है कि कुछ मामलों में निर्वाचन क्षेत्रों के सीमांकन में अब दिए गए स्थानों की संख्या से थोड़े-बहुत अंतर आ जाए। महामहिम की सरकार ऐसे उद्देश्य के लिए ऐसा थोड़ा अंतर रखने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखती है, बशर्ते वे वस्तुतः संप्रदायों के बीच अनिवार्य संतुलन को प्रभावित न करें। तथापि, बंगाल और पंजाब के मामले में ऐसा कोई अंतर नहीं रखा जाएगा।

  1. प्रांतों में दूसरे चैम्बर के गठन के प्रश्न पर संवैधानिक चर्चाओं में अब तक तुलनात्मक रूप से कम ध्यान दिया गया है और यह निर्णय करने को कि किन प्रांतों में दूसरे चैम्बर हों अथवा उनके गठन के लिए योजना तैयार किए जाने से पहले इस पर आगे और विचार किया जाना अपेक्षित है।

महामहिम की सरकार यह मानती है कि किसी प्रांत में अपर हाउस का गठन ऐसा होना चाहिए, जिससे लोअर हाउस के परिणामस्वरूप बने संप्रदायों के बीच के संतुलन को अनिवार्यतः न बिगाड़ा जाए।

  1. महामहिम की सरकार इस समय केंद्र में विधानमंडल के आकार और गठन के प्रश्न पर विचार करने का प्रस्ताव नहीं करती है, क्योंकि इसमें भारतीय रजवाड़ों के प्रतिनिधित्व जैसे अन्य प्रश्नों पर आगे विचार किया जाना आवश्यक है। निःसंदेह, वे गठन पर विचार करते समय उसमें पर्याप्त प्रतिनिधित्व के सभी संप्रदायों के दावों का पूरा-पूरा ध्यान रखेंगे।

  2. महामहिम की सरकार ने इस सिद्धांत को पहले ही स्वीकार कर लिया है कि यदि वित्तपोषण के संतोषप्रद साधन ढूंढ लिए जाते हैं, तो सिंध को एक पृथक प्रांत बना दिया जाएगा। चूंकि संघीय वित्त की अन्य समस्याओं के संबंध में अंतर्ग्रस्त वित्तीय समस्याओं की अभी पुनरीक्षा की जानी है, महामहिम की सरकार ने इस स्थिति में बंबई पे्रसीडेंसी प्रॉपर और सिंध के लिए पृथक विधानमंडलों की योजना के अलावा, विद्यमान बंबई प्रांत के लिए विधानमंडल के आंकड़े शामिल करना उपयुक्त समझा।

  3. बरार सहित मध्य प्रांत के लिए विधानमंडल के आंकड़ों की तालिका में शामिल करने का आशय यह नहीं है कि बरार की भावी संवैधानिक स्थिति के संबंध में कोई निर्णय ले लिया गया है।

लंदन,

4 अगस्त, 1932