परिशिष्ट - Page 478

परिशिष्ट - 23
सेवाओं में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व
भारत सरकार का संकल्प ख्1,

संस्थापनाएं

4 जुलाई, 1934

भाग-1ः समुदाय

सं एफ 14/17-बी.ः/33-विधानसभा में दिए गए आश्वासन के अनुसरण में भारत सरकार ने सांप्रदायिक असमानताओं को दूर करने के लिए सरकारी सेवा में सीधी नियुक्तियों के कुछ प्रतिशत पदों को आरक्षित करने की 1925 से चली आ रही नीति के परिणामों की ध्यानपूर्वक पुनरीक्षा की। यह अभ्यावेदन किया गया है कि यद्यपि इस नीति को अपनाने का मुख्य उद्देश्य सरकारी सेवाओं में मुसलमानों के लिए उत्तरोत्तर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था, यह उनके लिए नियुक्तियों का उनका अपेक्षित हिस्सा सुनिश्चित करने में विफल रही है और यह तर्क दिया गया कि इस स्थिति का हल तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक मुसलमानों के लिए रिक्तियों का एक निश्चित प्रतिशत आरक्षित नहीं किया जाता। विशेष रूप से ध्यान रेलवे की सेवाओं में मुसलमानों की कम संख्या की ओर दिलाया गया, यहां तक कि उस रेलवे में, जो उन स्थानों से गुजरती है जहां मुसलमानों का प्रतिशत वहां की कुल जनसंख्या में अधिक है।

स्थिति की समीक्षा करने पर पता चला कि ये शिकायतें उचित हैं, और भारत सरकार उसके द्वारा की गई जांच से संतुष्ट है कि सेवाओं में मुस्लिमों की स्थिति सुधारने की दृष्टि से नियुक्ति संबंधी अनुदेशों में संशोधन अवश्य किए जाने चाहिए।

  1. इस सामान्य प्रश्न पर विचार करते हुए भारत सरकार को आंग्ल-भारतीयों, प्रवासी यूरोपियनों और दलित वर्गों के दावों पर भी विचार करना होगा। सरकारी सेवा की कतिपय शाखाओं में नियुक्तियों में आंग्ल-भारतीयों का एक बड़ा प्रतिशत रहा है और यह स्वीकार किया जाता है कि इस नियोजन में संप्रदाय की निर्भरता को देखते हुए नई परिस्थितियों में आंग्ल-भारतीयों को उनके विद्यमान पदों से तेजी से निष्कासित करने को रोकने के लिए कदम अवश्य उठाए जाएं, जो इस संप्रदाय के आर्थिक ढांचे को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। कतिपय विभागों में आंग्ल-भारतीयों और प्रवासी यूरोपियनों के नियोजन के संबंध में अनुपालन किए जाने वाले अनुदेश इस

  2. भारत का राजपत्र, भाग- I, 7 जुलाई, 1934