470 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
नीति के अनुसार होंगे।
दलित वर्गों के संबंध में यह समान आधार है कि उन्हें सरकारी सेवाओं में समुचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए उपयुक्त कदम उठाए जाएं। इसके संबंध में स्वर्ण हिंदुओं की मंशा औपचारिक रूप से 1932 के पूना समझौते में दी गई है और महामहिम की सरकार ने इसे स्वीकार करते समय इस मुद्दे पर अपेक्षित ध्यान दिया था। इन वर्गों में सामान्य शिक्षा की वर्तमान स्थिति में भारत सरकार का यह मानना है कि हिंदुओं के लिए उपलब्ध कुल रिक्तियों में से एक निश्चित प्रतिशत इनके लिए आरक्षित करने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा, लेकिन वे यह सुनिश्चित करने की आशा रखते हैं कि दलित वर्गों के योग्य उम्मीदवारों को केवल इस आधार पर उपयुक्त अवसरों से वंचित न किया जाए, क्योंकि वे खुली प्रतियोगिता में सफल नहीं हो सकते।
भारत सरकार ने ऊपर दिए गए संप्रदायों के अतिरिक्त अन्य अल्पसंख्यक संप्रदायों की स्थिति का भी ध्यानपूर्वक अध्ययन किया है और वे इस बात से संतुष्ट हैं कि नए नियम उनके लिए, जैसा कि वर्तमान में है, सेवाओं में उपयुक्त प्रतिनिधित्व का उपबंध करते रहेंगे।
भाग- II ः नियमों का क्षेत्र
भारत सरकार नीचे दिए गए नियमों के पालन की निगरानी के लिए वार्षिक विवरणी देना अनिवार्य करने का प्रस्ताव करती है।
भारत सरकार ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के अनुमोदन से जिन सामान्य नियमों को ये उद्देश्य प्राप्त करने के लिए अंगीकार किया था, नीचे दिए गए हैं। वे सीधी भर्ती के संबंध में हैं, पदोन्नति द्वारा भर्ती के संबंध में नहीं, जो वर्तमान के अनुसार मात्र योग्यता के आधार पर की जाती रहेगी। वे भारतीय सिविल सेवा, केंद्रीय सेवाओं, श्रेणी- I और श्रेणी- II तथा भारत सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण वाली अधीनस्थ सेवाओं पर लागू होंगे, जिनमें से कुछ सेवाएं और वे पद जिनके लिए उच्च तकनीकी अथवा विशेष योग्यता होना आवश्यक होता है, अपवादस्वरूप होंगी, लेकिन ये नियम बर्मा प्रांत में इन सेवाओं में भर्ती पर लागू नहीं होंगे। रेलवे के संबंध में, चार राज्यों द्वारा संचालित रेलों में ये नियम निम्न कर्मचारियों और श्रमिकों के अलावा सभी पदों पर लागू होंगे, और कंपनी संचालित रेलों के प्रशासन को इन रेलों में सेवाओं के लिए इसी प्रकार के नियम अपनाने के लिए कहा जाएगा।