परिशिष्ट - 24
सेवाओं में अनुसूचित जातियों के
सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के संबंध में
भारत सरकार का संकल्प - 1943
गृह विभाग
संकल्प
नई दिल्ली, 11 अगस्त, 1943
संख्या-23.5.42 - स्था (एस) - केंद्रीय विधानसभा में 1942 में दिए गए आश्वासन के अनुसरण में भारत सरकार ने उसके प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन सेवाओं में दलित वर्गों, जिन्हें भारत सरकार अधिनियम, 1935 में ‘अनुसूचित जातियों’ के रूप में वर्णित किया गया है, के आरक्षण के संबंध में 1934 से अनुपालन की जा रही नीति की ध्यानपूर्वक समीक्षा की। अपने संकल्प सं. एफ. 14/17-बी/33, दिनांक 4 जुलाई, 1934 में भारत सरकार ने यह कहा था कि इन वर्गों में सामान्य शिक्षा की तत्कालीन स्थिति में वे यह नहीं मानते कि रिक्तियों का एक निश्चित प्रतिशत इनके लिए आरक्षित करने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा होगा। तथापि, अनूसूचित जातियों के लिए उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उन्होंने यह निर्देश दिया था कि इन वर्गों के योग्य उम्मीदवारों को किसी सरकारी सेवा में नाम-निर्देशित किया जा सकता है, चाहे उस सेवा के लिए भर्ती प्रतियोगिता द्वारा ही की जा रही हो। तब से सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जातियों का उत्तरोत्तर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न उपाय किए गए। तथापि, अब तक प्राप्त परिणाम पर्याप्त नहीं थे। जहां भारत सरकार यह स्वीकार करती है कि इसका प्रमुख कारण है उपयुक्त रूप से योग्य उम्मीदवार मिलने में कठिनाई, वे अब यह समझते हैं कि रिक्तियों के एक निश्चित आरक्षण से इन जातियों के उम्मीदवारों को बेहतर योग्यताएं प्राप्त करने के लिए आवश्यक प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाएगा और इस प्रकार उन्हें विभिन्न सरकारी पदों और सेवाओं के लिए अर्ह बनाने में सहायक सिद्ध होगा। यह आशा की जाती है कि आयु-सीमा में छूट देने तथा निर्धारित शुल्क में कमी करने से भी अनुसूचित जातियों के सदस्यों में से योग्य उम्मीदवार प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। तदनुसार भारत सरकार ने निम्नलिखित पैरा 4 में उल्लिखित नियम निर्धारित करने का निर्णय लिया। 2. वर्तमान अनारक्षित रिक्तियों के हिस्से के पात्र अन्य संप्रदायों की जनसंख्या के