4. एकता का विघटन - Page 62

रक्षा-व्यवस्था में कमजोरी

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सीमा न मानने का एक मुख्य कारण अन्यत्र प्रतीत होता है। मि. डेवीज ने इन शब्दों में वास्तविक कारण बताया हैः

फ्जब हम वर्तमान उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के निवासियों की दृष्टि से

देखते हैं तो वापस सिंध की आवाज महज एक बेतुकी बात लगती है।

वहां से हट जाने से न केवल हमारी प्रतिष्ठा को धक्का लगेगा, बल्कि यह

उन लोगों को भी भारी धोखा देना होगा जो हमारे कल्याणकारी शासन के

अंतर्गत आ रहे हैं।य्

वास्तव में इस बात पर जोर देने का कोई लाभ नहीं कि एक विशेष सीमा सबसे अधिक सुरक्षित होगी। इसका सीधासादा कारण यह है कि आज की दुनिया में भौगोलिक परिस्थितियां निर्णायक नहीं हैं और आधुनिक तकनीकों के सामने सीमाओं का पुराना महत्व बहुत कम हो गया है, चाहे वहां पर ऊंचे-ऊंचे शक्तिशाली पर्वत, बड़े-बड़े झरने, विशालकाय महासागर या दूर-दूर तक फैले रेगिस्तान क्यों न हों।

दूसरी बात यह है कि जिन देशों की प्राकृतिक सीमाएं नहीं होतीं, वे भी इस कमी पर काबू पा लेने के तरीके ढूंढ लेते हैं। ऐसे देशों की कमी नहीं जिनकी प्राकृतिक सीमाएं नहीं हैं, परन्तु सभी ने प्रकृति की कमी को दूर करने के लिए कृत्रिम बाधाएं

खड़ी करके रक्षा-पंक्तियां मजबूत कर ली हैं, जो प्राकृतिक बाधाओं से अधिक अभेद्य हैं। यह मानने का कोई कारण नहीं कि हिंदू वह नही कर पाएंगे जो अन्य देशों ने किया है। साधन होने पर हिंदुओं को इस बात से डरने की कोई जरूरत नहीं कि उनके पास प्राकृतिक दृष्टि से सुरक्षित सीमाएं नहीं हैं।

II

संसाधनों का प्रश्न

प्राकृतिक सीमाओं से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न संसाधनों का है। यदि अपेक्षित उपकरणों के लिए पर्याप्त संसाधन हों तो अप्राकृतिक या कमजोर सीमाओं के कारण पैदा होने वाली कठिनाइयों पर काबू पाया जा सकता है। इसलिए हमें पाकिस्तान और हिंदुस्तान के तुलनात्मक संसाधनों के बारे में अवश्य विचार करना चाहिए। नीचे दिए गए आंकड़ों से इनके तुलनात्मक संसाधनों का पता चलता हैः