अध्यायः 6
पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति
प्रत्येक हिंदू एक प्रश्न निश्चित रूप से पूछेगा कि क्या पाकिस्तान से सांप्रदायिक समस्या हल हो जाएगी। इस प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर प्राप्त करने के लिए इस समस्या के गहन विश्लेषण की आवश्यकता है। पहले हमें यह अच्छी तरह समझना चाहिए कि जब हिंदू और मुसलमान सांप्रदायिक प्रश्न की बात करते हैं, तो उसका वास्तव में क्या तात्पर्य है। इसके अभाव में यह बताना संभव नहीं होगा कि क्या पाकिस्तान से सांप्रदायिक समस्या हल होगी या नहीं होगी।
यह बात आम तौर पर नहीं समझी जाती कि सीमा के लिए फ्अग्रगण्य नीतिय् की तरह सांप्रदायिक प्रश्न के भी अधिक व्यापक और कम व्यापक अभिप्राय हैं और जब लघु अभिप्राय में इसका एक अर्थ होता है तो अधिक व्यापक अभिप्राय में इसका बिल्कुल भिन्न अर्थ हो जाता है।
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पहले हम सांप्रदायिक प्रश्न के लघु अभिप्राय वाले पहलू पर विचार करेंगे। लघु अभिप्राय के अंतर्गत सांप्रदायिक प्रश्न का हिन्दुओं और मुसलमानों के प्रतिनिधित्व से संबंध है। इस दृष्टि से इस प्रश्न के अंतर्गत इन दो विशिष्ट समस्याओं पर विचार करना होगा - (क) विभिन्न विधानमंडलों में हिंदुओं और मुसलमानों को कितने-कितने स्थान दिए जाएं, और (ख) इन स्थानों को भरने के लिए निर्वाचक-मंडल या मतदाता कैसे हों।
गोलमेज सम्मेलन में मुसलमानों ने ये दावे पेश किए थेः
(1) सभी प्रांतीय और केंद्रीय विधानमंडलों में उनके प्रतिनिधि पृथक चुने जाएं। (2) जिन प्रांतों में मुसलमानों की जनसंख्या अल्पमत में है, वहां उन्हें अधिक
प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसके अतिरिक्त जिन प्रांतों में वे बहुमत में हैं जैसे कि
पंजाब, सिंधु, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और बंगाल, वहां उन्हें एक कानूनी गारंटी
दी जाए कि सीटों में बहुमत उनका होगा।