90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
हिंदुओं ने शुरू से ही मुसलमानों की इन मांगों का विरोध किया। उन्होंने जोर दिया कि सभी केंद्रीय और प्रांतीय विधानमंडलों के चुनावों के लिए हिंदुओं और मुसलमानों के संयुक्त निर्वाचक-मंडल होने चाहिएं और जहां कहीं वे अल्पमत में हों, वहां हिंदुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात से हो। उन्होंने इस बात पर घोर आपत्ति की कि किसी विशिष्ट संप्रदाय को कानूनन बहुमत प्राप्त हो।
ब्रिटिश सरकार ने अपने कम्यूनल एवार्ड द्वारा इसका एक सरल, स्थूल और त्वरित हल ढूंढ निकाला और मुसलमानों को वह सब कुछ दे दिया गया जो वे चाहते थे और हिंदुओं के विरोध की कतई परवाह नहीं की गई। एवार्ड द्वारा मुसलमानों को अधिक प्रतिनिधित्व भी मिल गया और पृथक निर्वाचक-मंडल भी। इसके अतिरिक्त, जिन प्रांतों की जनसंख्या में उनका बहुमत था वहां उन्हें कानूनन सीटों में बहुमत देने की व्यवस्था भी कर दी गई।
इस एवार्ड में ऐसी कौन सी बात है जिसके आधार पर कहा जा सके कि इस एवार्ड से समस्या पैदा हो गई? क्या ब्रिटिश सरकार के कम्यूनल एवार्ड के विरोध में हिंदुओं द्वारा उठाई गई आपत्तियों में कोई दम है? इस प्रश्न पर हमें सावधानीपूर्वक विचार करना होगा ताकि यह पता चल सके कि एवार्ड के बारे में हिंदुओं की आपत्तियों में वास्तविकता कितनी है।
प्रथमतः जहां तक मुस्ल्मि अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व में वजन दिए जाने के प्रति आपत्ति का संबंध है, अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने का जो भी तरीका ठीक हो, हिंदू इस बात पर सही आपत्ति नहीं कर सकते कि मुसलमानों को वजन दिय गया है क्योंकि जिन प्रांतों में हिंदू अल्पसंख्या में हैं और जहां वजन की गुंजाइश है, वहां उन्हें भी वजन दिया गया है। सिंध और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में हिंदुओं को वही महत्व दिया गया है।
दूसरे, उन्हें मुसलमानों को वैधानिक बहुमत प्रदान करने पर जो आपत्ति है उसके पीछे भी कोई ठोस आधार नजर नहीं आता। सैद्धांतिक और दार्शनिक विवेचन में तो गारंटीशुदा प्रतिनिधित्व को गलत, कुचक्री और पूरी तरह अन्यायपूर्ण बताया जा सकता है। परंतु हिंदुस्तान में आजकल जैसी परिस्थितियां हैं, संवैधानिक बहुमत देने की बात को अपरिहार्य मानना ही पड़ता है। एक बार जब यह मान लिया जाए कि अल्पसंख्यकों को दिए गए प्रतिनिधित्व से बहुमत को अल्पमत में नहीं बदल देना चाहिए, तो उसका प्रतिकार करने के लिए बहुमत को बहुमत में बनाए रखने के लिए वैधानिक व्यवस्था करनी जरूरी है। कारण, अल्पसंख्कों की सीटें निर्धारित करते समय बहुमत की सीटें भी निर्धारित करनी पड़ेंगी। यदि हम यह स्वीकार करते हैं कि अल्पसंख्यकों को इतना प्रतिनिधित्व नहीं देना चाहिए कि अल्पमत बहुमत में बदल जाए, तो वैधानिक बहुमत