86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह चेतावनी देने के बाद इस मामले में श्री गांधी लम्बी तान कर सो गए। उनका सोच था कि उन्होंने आमरण अनशन की जो धमकी दी थी, ब्रिटिश्श सरकार को झकझोर देने के लिए तथा अस्पृश्यों के विशेष प्रतिनिधित्व के दावे पर तुषारापात करने के लिए काफी है। 17 अगस्त, 1932 को प्रधानमंत्री ने सांप्रदायिक प्रश्न पर अपने निर्णय की घोषणा की। उसमें अस्पृश्यों से संबंधित जो निर्णय दिया गया था वह इस प्रकार था -
फ्ब्रिटिश सरकार का 1932 का सांप्रदायिक निर्णयय्
दूसरे गोलमेज सम्मेलन के पश्चात् प्रधानमंत्री ने 1 दिसंबर, 1931 को
जो वक्तव्य दिया वह संसद में भेज दिया गया। उसका संसद के दोनों सदनों
ने समर्थन किया। उसमें यह बात स्पष्ट कर दी गई थी कि भारत के सभी
समुदाय गोलमेज सम्मेलन में सांप्रदायिक प्रश्न पर किसी सर्वमान्य समझौते
पर नहीं पहुंच पाए हैं। ब्रिटिश सरकार ने संकल्प किया है कि भारत के
संविधान का विकास केवल उन असफलताओं के कारण रुक न जाए और
कोई तदर्थ योजना लागू करके इस बाधा को समाप्त किया जाए।
- पिछली 19 मार्च को ब्रिटिश सरकार को सूचना मिली थी कि नए
संविधान निर्माण की योजना में समुदायों द्वारा किसी समझौते पर न पहुंचने
के कारण प्रगति रुकी हुई है और वे लोग इस विषय में उत्पन्न मतभेदों की
समीक्षा करने में व्यस्त हैं। अब उनकी सिफारिश है कि नए संविधान के
अंतर्गत अल्पसंख्यकों की समस्याओं के कुछ पहलुओं पर निर्णय लिए बिना
नए संविधान के निर्माण में कोई प्रगति नहीं हो सकती।
- अतः इस संदर्भ में ब्रिटिश सरकार ने निर्णय लिया है कि उचित समय
में संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले भारतीय संविधान से संबंधित प्रस्तावों
में नीचे दी गई योजना को मूर्त रूप देने के लिए वे प्रावधान करेंगे। इस
योजना का उद्देश्य अंग्रेजी राज में प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं में प्रतिनिधि तक
सीमित रहेगा। निम्नलिखित परिच्छेद 20 में वर्णित कारणों से केंद्रीय सभा
में प्रतिनिधित्व का मामला निलंबित कर दिया जाएगा। योजना को सीमित
करने के निर्णय का अर्थ यह नहीं कि हम यह समझने में असफल रहे हैं
कि संविधान का निर्माण करते समय अल्पसंख्यकों की असंख्य महत्वपूर्ण
समस्याएं उठ खड़ी होंगी, वरन् इस आशा से ऐसा किया जा रहा है कि
समुदायों के प्रतिनिधित्व के अनुपात और ढंग तथा मूल प्रश्नों पर एक बार
घोषणा हो जाने पर वे समुदाय स्वयं अन्य सांप्रदायिक समस्याओं का हल
निकाल सकेंगे।