तुच्छ चालें
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ब्रिटिश सरकार की योजना के अंतर्गत दलित वर्ग हिंदू समाज के अंग बने रहें और वे चुनाव में आम सीटों पर हिंदुओं के साथ ही मतदान करेंगे, परंतु यह व्यवस्था प्रथम बीस वर्षों तक रहेगी। हिंदू समाज का अंग रहते हुए भी उनके लिए सीमित संख्या में निर्वाचन-क्षेत्र होंगे, जिसमें उनके अधिकारों और हितों की रक्षा हो सके - वर्तमान स्थितियों में ऐसा करना नितांत आवश्यक हो गया है।
जहां विशेष निर्वाचन-क्षेत्र होंगे, वहां सामान्य हिंदुओं के निर्वाचन-क्षेत्रों में दलित वर्गों को मत देने से वंचित नहीं किया जाएगा। इस प्रकार दलित वर्गों के लिए दोहरे मतों का अधिकार होगा। एक विशेष निर्वाचन-क्षेत्र के अपने सदस्य के लिए, दूसरा हिंदू समाज के सामान्य सदस्य के लिए, जिसे आपने अस्पृश्यों के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन कहा है, हमने जान-बूझकर उसके विपरीत फैसला दिया है और तय किया है कि दलित वर्ग के मतदाता सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों में सवर्ण हिंदू उम्मीदवारों को मत दे सकेंगे तथा सवर्ण हिंदू मतदाता दलित उम्मीदवार के पक्ष में उसके निर्वाचन-क्षेत्र में मतदान कर सकेंगे। इस प्रकार हिंदू समाज की एकता को सुरक्षित रखा गया है।
हमने यह बात अनुभव की है कि उत्तरदायी सरकार के आरंभिक काल में प्रांतीय विधानसभाओं में, जो भी बहुमत में आए वहां दलितों की पसंद के भी कुछ प्रतिनिधि चुने जाएं, जबकि स्वयं आपने सर सैमुअल होर को अपने पत्र में लिखा था कि सवर्ण हिंदुओं ने दलितों को सदियों से दलित बना रखा है। इसलिए नौ प्रांतों में से सात प्रांतों की विधानसभाओं में अपनी कठिनाइयों की आवाज उठाने के लिए उन्हें भी चुना जाए और यदि उनके हितों के विरुद्ध कुछ किया जाए, तो उसके विरोध में अपने विचार रख सकें, जिनकी बात विधानसभा या सरकार में कोई नहीं सुनता। हमने वही किया है, जैसा किसी भी बेबाक व्यक्ति को करना चाहिए। हम नहीं समझते कि वर्तमान हालात में मताधिकार की किसी प्रणाली के तहत यह व्यावहारिक हो सकता है कि ऐसे प्रतिनिधि, जो वास्तव में उनके प्रतिनिधि हैं, बहुमतप्राप्त सवर्ण हिंदुओं द्वारा चुने जाएंगे।
हमारी योजना में सामान्य हिंदू निर्वाचन-क्षेत्रों में दलितों को मतदान के अधिकार दिए गए हैं। इसके साथ-साथ उनके लिए सीमित संख्या में जो विशेष निर्वाचन-क्षेत्र बनाए जाएंगे वे मुसलमानों के पृथक सांप्रदायिक निर्वाचन के सिद्धांत से सर्वथा भिन्न हैं। उदाहरण के तौर पर मुसलमान