3. तुच्छ चालें - Page 105

90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ही बेकार होगा। ऐसी दशा में अनशन करते हुए यदि मेरे प्राण भी चले जाते हैं, तो वह मेरी गलतियों का प्रायश्चित होगा और उन तमाम असंख्य पुरुषों और स्त्रियों का, जो मेरी समझदारी पर अटूट विश्वास करते हैं, बोझ हल्का हो जाएगा। यदि तमाम चिंतन के बाद लिया गया मेरा निर्णय, जिसमें मुझे बिल्कुल संदेह नहीं है, और यह निर्णय सही है भी तो इससे मेरे जीवन की उस योजना की उल्लेखनीय क्रियान्विति होगी जिसके लिए मैंने 28 वर्ष से भी अधिक समय तक काम किया है।य्

आपका मित्र

मो. क. गांधी

प्रधान मंत्री का उत्तर था -

फ्प्रिय श्री गांधी,

10 डाउनिंग स्ट्रीट

8 सितम्बर, 1932

मुझे आपका पत्र मिला। पढ़कर मुझे आश्चर्य हुआ और बड़ा अफसोस भी। मैं सोचता हूं, यह पत्र आपने गलतफहमी में आकर लिखा है। ब्रिटिश सरकार ने दलित वर्गों से संबंधित जो फैसला लिया है, वास्तव में वह ठीक है। हमने सदैव यही समझा है कि आप दलित वर्गों को हिंदू समाज में स्थायी रूप से अलग करने का डटकर विरोध करते रहे हैं। आपने गोलमेज सम्मेलन की अल्पसंख्यक समिति में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। 11 मार्च को पुनः सर सैमुअल होर को अपने पत्र में आपने अपने विचार प्रकट किए थे। हम यह भी जानते हैं कि विशाल हिंदू समाज के विचार आपके जैसे ही हैं। इसलिए दलितों के प्रतिनिधित्व के इस प्रश्न पर हमने गंभीरतापूर्वक विचार किया था।

हमें जब दलित संस्थाओं से बहुत सी अपीलें प्राप्त हुईं, सभी लोग यह भी मानते हैं कि सामाजिक विषमताओं से शोषण होता है और आपने भी यह स्वीकार किया है, तो हमने यह अपना कर्तव्य समझा कि विधानसभाओं में दलित वर्गों को सही अनुपात में प्रतिनिधित्व के अधिकारों की सुरक्षा की व्यवस्था की जाए। हम ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहते थे, जिससे उनका संबंध हिंदू समाज से टूट जाए। आपने स्वंय अपने 11 मार्च के पत्र में लिखा था कि आप विधानसभाओं में उनके प्रतिनिधित्व के विरुद्ध नहीं थे।