तुच्छ चालें
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विभिन्न वर्गों के अभ्यर्थियों के लिए विभिन्न प्रकार की योग्यताएं निर्धारित की गई थीं। सवर्ण हिंदुओं, जैसे ब्राह्मणों और उनसे मिलती-जुलती उच्च जातियों के काफी सुयोग्य प्रत्याशियों को ही चुना जाता था। वे गैर-ब्राह्मण जिनकी इस मामले में अच्छी योग्यता वालों की अपेक्षा कम योग्यता वालों को वरीयता दी जाती थी। अस्पृश्यों के मामले में अर्धशिक्षित या अंगूठा-टेक लिए जाते थे। मैं यह नहीं कहता कि ऐसा सभी मामलों में सही है। परन्तु सामान्य रुझान यहीथा कि कांग्रेस द्वारा जिन प्रत्याशियों का चुनाव होता था, उनमें से ब्राह्मणों तथा सवर्ण हिंदुओं के उम्मीदवार सुयोग्य होते थे जबकि अछूतों में से अशिक्षितों को चुन लिया जाता था। इस प्रकार की साजिश का उद्देश्य केवल यही था कि ब्राह्मणों और उनकी सहयोगी जातियों का ही प्रभुत्व मंत्रिमंडल में रहे और उन्हें गैर-ब्राह्मणों तथा अस्पृश्यों का पूरा समर्थन मिलता रहे और आज्ञाकारी अस्पृश्य तथा गैर-ब्राह्मण कभी भी उस मंत्रिमंडल में उनके विरोधी बनने का स्वप्न न देख सकें, वरन वे इसी से संतुष्ट रहें कि वे विधान-मंडलों के सदस्य हैं और वे सदस्य बनकर आ गए हैं। श्री गांधी मामले के इस पहलू को उस समय नहीं देख सके जब उन्होंने कहा था कि उसी अस्पृश्य को मंत्री बनाया जाए, जो सुयोग्य हो। अन्यथा वह समझते कि यदि कांग्रेसियों में योग्यता प्राप्त अस्पृश्य नहीं हैं, तो इसका कारण यह था कि कांग्रेस संसदीय बोर्ड अछूतों में से सुयोग्य अभ्यर्थियों को चुनता ही नहीं। यदि चुनाव की वर्तमान व्यवस्था कायम रहती है, तो कांग्रेस भारतीयों को विधान-मंडल का सदस्य होने से सदैव रोक सकती है, जो मंत्रिमंडल में पहुंचने की पहली सीढ़ी है। यह बहुत दुःखद बात है कि कांग्रेसियों द्वारा अस्पृश्य प्रत्याशियों का इस प्रकार चुनाव करने की योजना बनाना कि उन अस्पृश्यों को मंत्री पद से वंचित किया जाए, यह बहाना बनाकर कि वे योग्यता प्राप्त नहीं हैं, उन पर बहुत बड़ा आघात करना है जो रहस्यमय ढंग से और भीतर ही भीतर षड्यंत्र का अंग है।
कांग्रेस का दूसरा दोष यह था कि अस्पृश्य कांग्रेसियों को कड़े दलीय अनुशासन का डंडा दिखाया जाता था। वे कांग्रेस कार्यसमिति के नियंत्रण में रहते थे। वे ऐसा विधान नहीं ला सकते थे जिसे कांग्रेस पसंद न करती हो। वे बिना इजाजत कोई प्रस्ताव नहीं ला सकते थे। वे विधान-मंडल में यह विधेयक नहीं ला सकते थे, जिस पर उन्हें एतराज हो। वे अपनी पसंद से मतदान नहीं कर सकते थे और उचित बात भी नहीं बोल सकते थे। वे वहां पर खींच कर लाए जाने वाले बेजबान जानवरों के समान थे। अस्पृश्यों के लिए विधान-मंडल में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने का मुख्य उद्देश्य अपने वर्ग की कठिनाइयों को उजागर करना और अत्याचारों पर काबू पाना था जिसे कांग्रेस ने सफलतापूर्वक प्रभावी ढंग से रोक दिया।
इस लंबी दुःखभरी कहानी का अंत करने के लिए कांग्रेस ने पूना पैक्ट रूपी फल से प्राप्त रस को चूस लिया और छिलका अस्पृश्यों के मुंह पर दे मारा।