106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
- पहली बात तो यह है कि मौजूदा संविधान को मैं पंसद ही नहीं
करता क्योंकि वह बेजान है। परंतु मैं उसी आधार पर जिसका उल्लेख ऊपर
किया गया है, आपके प्रस्ताव का विरोध करता हूं।
- पहले बताए कारणों से मैं इस सुझाव के भी विरुद्ध हूं। परंतु मैं
निर्वाचक कांग्रेस संस्थाओं को विवश करूंगा कि वे कांग्रेस रजिस्टर में
हरिजन सदस्यों की संख्या के अनुपात में हरिजनों को अवश्य निर्वाचित करें।
अगर हरिजन चार आने की सदस्यता शुल्क देकर कांग्रेस के सदस्य नहीं
होना चाहते तो उनका नाम निर्वाचित संस्थाओं में कैसे हो सकता है? परंतु
मैं कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जोर देकर कहूंगा कि वे हरिजनों के पास जाएं
और उन्हें कांग्रेस सदस्य बनने के लिए प्रोत्साहित करें।य्
अब क्या इसमें और भी कोई संदेह रह गया है कि श्री गांधी और कांग्रेस यह गांठ बांधकर बैठे हुए थे कि मंत्रिमंडल में अस्पृश्यों के प्रतिनिधित्व के अधिकार को मान्यता न मिल जाए। जहां तक योग्यता का प्रश्न है, यदि श्री गांधी समस्त अल्पसंख्यकों पर कुछ शर्तें लागू कर देते, तब भी उनकी कोई तुक होती। क्या श्री गांधी मुसलमानों की मांग पर यही कहने का साहस कर सकते थे? केवल अस्पृश्यों के लिए ही रास्ते बंद करने का क्या अर्थ था? किसी ने भी इस प्रकार का दावा नहीं किया है कि अयोग्य अस्पृश्य मंत्री बना दिए जाएं। इससे केवल श्री गांधी के मन में पड़ी गांठ ही परिलक्षित होती है।
कांग्रेस ने पूना पैक्ट को पलीता लगाने के लिए जितने पैंतरे अपनाए उनमें से दो मुख्य हैं। पहले तो कांगेस की उस नीति से संबंधित है जो कांग्रेस संसदीय बोर्ड ने चुनाव के लिए उम्मीदवार चुनने के बारे में अपनाई थी। दुर्भाग्यवश इस प्रश्न का उसकी महत्ता के अनुसार गहन अध्ययन नहीं किया गया। मैंने इस प्रश्न का विवेचन किया है और मैं उसके नतीजे प्रमाण सहित अलग से प्रकाशित करने की आशा करता हूं। उन बोर्डों में अभ्यर्थियों के चुनाव के लिए जो सिद्धांत अपनाए गए थे, मैं उनका उल्लेख कर रहा हूं। बोर्डों में कांग्रेस सांप्रदायिकता की मुख्य भूमिका निभा रही थी। जिस निर्वाचन-क्षेत्र में दो अभ्यर्थियों का चुनाव होना था, वहां योग्यता ताक पर रख दी गई। क्या कांग्रेस ने सुयोग्य को चुना? उन्होंने उस जाति के प्रत्याशी को चुना, जिसका वहां बाहुल्य था। धन दौलत भी उनका एक सूत्र था। एक गरीब और योग्य प्रत्याशी की अपेक्षा अधिक धनी अभ्यर्थी को प्राथमिकता दी जाती थी। ये सभी सिद्धांत न्यायोचित नहीं थे। परंतु उनका ध्येय था कि उम्मीदवार सरलता से सीट निकाल ले। परंतु कुछ अन्य ऐसे भी सिद्धांत थे, जिससे कांग्रेस की गहरी चाल स्पष्ट हो जाती है।