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घृणित समर्पण

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उन्होने कहा था कि उसके बगैर उन्हें जीवन में कोई रुचि नहीं रह गई है, क्या श्री गांधी ने प्रतिकार किया? क्या इसका यह अर्थ नहीं कि केवल चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने जो विश्वासघात किया था, इसी कारण श्री गांधी ने उस कुकृत्य की भर्त्सना नहीं की। बल्कि इसके विपरीत, उन्होंने श्री राजगोपालाचारी को दोषी ठहराने के बजाए श्री रंगा अय्यर को इसलिए दोषी ठहराया कि उन्होंने विधेयक पर कांग्रेसी समर्थन की वापसी पर आक्रोश में आकर भर्त्सना की थी। हरिजन के 31 अगस्त, 1934 के अंक में उन्होंने लिखा µ

फ्अभागे मंदिर प्रवेश विधेयक को, जैसा इसके प्रस्तावक ने किया वैसे नहीं

बल्कि अधिक शिष्ट ढंग से दफनाया जाना चाहिए था। इस विधेयक को

सुधारवादियों का संरक्षण नहीं मिला हुआ था। इसलिए विधेयक पेश करने

वाले को चाहिए था कि वह समाज-सुधारकों से विधेयक के संबंध में राय

लेता और उनके निर्देशानुसार कार्य करता। जहां तक मुझे मालूम है, विधेयक

प्रस्तावक के लिए क्रोध करने की गुंजाइश नहीं थी, जिसके कारण उसने

कांग्रेसियों को विश्वासघाती बताते हुए अपनी अप्रसन्नता प्रकट की। वह

विधेयक सीधे-सीधे धार्मिक व्यवहार के उद्देश्य से लाया गया था और बम्बई

में 25 सितंबर, 1932 को पंडित मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में हिंदू

प्रतिनिधियों की सभा में की गई घोषणा पर आधारित था। इच्छुक पाठक

घोषणा के विषय में तत्कालीन पत्र फ्हरिजनय् के मुख्य पृष्ठ पर छपे प्रत्येक

सप्ताह के लेख में पढ़ सकते हैं। इसलिए प्रत्येक हिंदू चाहे वह सवर्ण हो

अथवा हरिजन, इस विषय में रुचि लेता था। यह वह विषय नहीं था, जिसमें

दूसरे हिंदुओं की अपेक्षा कांग्रेसी हिंदू ही अधिक रुचि लेते रहे हों। इसलिए

वादविवाद में कांग्रेस का ही नाम घसीटना दुर्भाग्यपूर्ण था। विधेयक को सौम्य

ढंग से संचालित करना चाहिए था।य्

मंदिर-प्रवेश विधेयक के बारे में कहा जा सकता है कि वह राजनीतिक कलाबाजी थी। श्री गांधी का मंदिर-प्रवेश विधेयक पर फिसलना शुरू हो गया था। जब अस्पृश्य राजनीतिक अधिकारों की मांग पेश करते हैं तब श्री गांधी अपनी स्थिति बदल देते हैं और मंदिर प्रवेश के समर्थक बन जाते हैं। हिंदू जब चुनावों में कांग्रेस को हराने की धमकी देते हैं, तब राजनीतिक शक्ति को कांग्रेस के हाथों में सुरक्षित रखने के लिए मंदिर-प्रवेश समर्थन को माचिस दिखा देते हैं। क्या यही ईमानदारी है? क्या यह कोई संकल्प है? क्या यह कोई आत्मिक संताप नहीं था, जिसको श्री गांधी ने घुमा-फिरा कर कहा।