4. घृणित समर्पण - Page 147

132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्समस्त कांग्रेस के लोगों को इस बात की छूट है कि इसे अधिकाधिक

कांग्रेसी विधेयक बनाने से पहले उस पर अच्छी तरह सोच विचार कर

लें।य्

फ्मुझे आशा है कि सभी संविधानवेत्ता चाहे हिंदू हों अथवा मुसलमान,

अस्पृश्यों के हितों की रक्षा करने के लिए एकजुट हो जाएंगे। उनमें बाद में

सांप्रदायिक मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं, परंतु वे संगठित होंगे और कांग्रेस

की नौटंकियों से लड़ने में सहयोग कर उन्हें पराजित करेंगे। महोदय! मैं

समझता हूं कि अस्पृश्यों और दलितों के हितों के साथ यह विश्वासघात है।

मैं इस आंदोलन में विश्वास नहीं रखता, यदि श्री गांधी पहले ही इस समस्या

को अपने हाथ में ले लेते अथवा श्री राजगोपालाचारी दिल्ली में हर दरवाजे

पर दस्तक न देते तो मैं इस प्रकार का विधेयक न लाता।य्

VI

यह गरिमा से पीछे हटने की बात थी और वह भी कितनी निंदनीय। इस पर श्री गांधी की क्या प्रतिक्रिया थी? 4 नवंबर, 1932 को एक बयान में श्री गांधी ने कहा µ

फ्गांवों में अस्पृश्यों को अनुभव करना चिहए कि उनकी बेडि़यां टूट चुकी

हैं, वे दूसरे ग्रामवासियों से किसी तरह हीन नहीं हैं। वे उसी ईश्वर के पुजारी

हैं, जिसके अन्य ग्रामवासी हैं और उन सभी अधिकारों और सुविधाओं के

हकदार हैं, जो अन्य सभी ग्रामवासियों को प्राप्त हैं। परंतु यदि सवर्ण हिंदुओं

द्वारा समझौते की मूलभूत शर्तों का पालन नहीं किया जाता, तो मैं भगवान

को और समाज को क्या मुंह दिखाऊंगा। मैं दलित वर्ग से संबंधित मित्रों

डॉ. अम्बेडकर और राव बहादुर एम.सी. राजा से कहता हूं कि वे सवर्ण

हिंदुओं को रास्ते पर लाने तक मुझे अपना बंधक समझें। यदि इसके लिए

अनशन भ्ी करना पड़ता है, तो सुधारों के विरोधी इसे बलपूर्वक नहीं रोक

सकेंगे। जो मेरे मित्र हैं, वे उस कार्य को करेंगे। यदि वे अपने संकल्प से

पीछे हटते हैं अथवा यदि उन शर्तों से आंख चुराते हैं या साथ मिलकर

नहीं चलते हैं और कहते हैं कि हिंदुत्व केवल पाखंड है, तो मेरा जीवन

निरर्थक है।य्

श्री गांधी इसे दुहराते कभी नहीं थकते थे। हिंदू मंदिरों से अस्पृश्यों के बहिष्कार को उन्होंने अपनी आत्मा की पीड़ा की संज्ञा दी। इसके संबंध में श्री गांधी ने क्या किया? उस योजना पर राजगोपालाचारी के विश्वासघात के बाद, जिसके संबंध में