अध्यायः 5
राजनीतिक दान
कांग्रेस की अस्पृश्यों को मेहरबानी करके मारने की योजना
I
बम्बई के कावस जी जहांगीर हाल में, पंडित मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में 30 सितम्बर, 1932 को एक सभा हुई, जिसमें हिंदुओं ने बहुत बड़ी संख्या में भाग लिया। सभा का उद्देश्य था अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी संघ (ऑल इंडिया एंटी-अनटचेबिलिटी लीग) की स्थापना करना, तथा उसकी शाखाएं विभिन्न प्रांतों और केंद्रों में खोलना। दिल्ली में उस लीग का मुख्यालय बनने वाला था। श्री घनश्याम दास बिड़ला उसके अध्यक्ष और अमृतलाल ठक्कर उसके महामंत्री बनने वाले थे। ऑल इंडिया एंटी अनटचेबिलिटी लीग की स्थापना करना श्री गांधी की योजना थी। उस लीग को श्री गांधी से प्रोत्साहन मिला था और यह पूना पैक्ट का परिणाम था। उत्पत्ति काल से ही यह लीग एक प्रकार से श्री गांधी का धर्मपुत्र था। श्री गांधी ने पहला काम यह किया कि उसका नाम बदल दिया। एक प्रेस विज्ञप्ति, जो 9 दिसंबर, 1932 को प्रसारित हुई थी, जिसमें गांधी ने जनता से कहा था कि यह संस्था अब से फ्सर्वेंट्स ऑफ दि अंटचेबुल्स सोसायटीय् के नाम से जानी जाएगी। यह नाम गांधीजी को पसंद नहीं था और वह दूसरे नाम की तलाश में थे। अंत में उन्होंने उसका नया नामकरण किया फ्हरिजन सेवक संघय् - जिसका अर्थ था, उन लोगों की संस्था, जो अस्पृश्यों की सेवा में लगे हों। यह श्री गांधी द्वारा दिया हुआ नाम था, जिसे वह अस्पृश्यों के लिए प्रयोग करते थे। इससे शैवों और वैष्णवों के बीच विवाद खड़ा हो गया। विष्णु के सौ नामों में से फ्हरिय् एक नाम है, जबकि फ्हरय् शिव के सौ नामों में से एक है। फ्हरिजनय् नाम चुनने में श्री गांधी को किसी एक पंथ का पक्षपाती होने का दोषी ठहराया गया। शैवों का विचार था कि अछूतों को फ्हरजनय् कहा जाए, जिसे श्री गांधी ने स्वीकार नहीं किया और उस नई संस्था का नाम फ्हरिजनय् पर रखा गया।