राजनीतिक दान
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रुपए ख्1, इकट्टòे किए। जैसा कि यात्रा का मुख्य उद्देश्य अस्पृश्यों के हित में सवर्ण हिंदुओं के अंदर उत्साह पैदा करना था और धन भी एकत्र करना था, श्री गांधी ने अधिकतर यात्रा पैदल चलकर की। श्री गांधी ने आठ लाख रुपए एकत्र किए। उपरोक्त धनराशि तथा श्री गांधी के धनी मित्रों द्वारा दानस्वरूप, जो धन एकत्र हुआ, उसमें हरिजन सेवक संघ ने अपना काम आरंभ किया।
हरिजन सेवक संघ सितंबर 1932 से चल रहा है। अस्पृश्यों की दुर्दशा पर तथा उनके उत्थान के लिए श्री गांधी कितने चिन्तित हैं, और उनकी आत्मा में जो व्यथा है उसका यह संघ शानदार साक्षी है। संघ के महामंत्री ने दिल्ली में संघ के भवन में बहुत से अमरीकी लोगों को आमंत्रित किया और उन्हें दिखाया कि श्री गांधी द्वारा अस्पृश्यों के कल्याण के लिए कितना अनूठा कार्य किया जा रहा है।
सभी को पददलित लोगों के कल्याण के लिए किए जा रहे कार्यों की प्रशंसा करनी चाहिए। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी कभी आलोचना न की जाए। यह जांच करना उचित ही होगा कि जबसे संघ बना है तब से वह क्या कार्य कर रहा है। जिस किसी ने भी संघ की वार्षिक रिपोर्ट का अवलोकन किया है, वह देखेगा कि वही घिसीपिटी बातें दोहराई जा रही हैं। शिक्षा के क्षेत्र में, संघ ने अस्पृश्यों के लिए कला, प्राविधिक तथा व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए छात्रवृत्तियां आरम्भ करके उनकी सहायता कर उनमें उच्च शिक्षा को बढ़ावा दिया है। संघ हाई स्कूल तक के विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियां भी देता है। संघ उन अस्पृश्य विद्यार्थियों के लिए, जो कॉलेजों और हाई स्कूल में पढ़ते हैं, छात्रावास का प्रबंध करता है। जहां आस-पास में सामान्य स्कूल नहीं थे अथवा जहां उनके लिए सामान्य स्कूल बंद थे, वहां प्राथमिक स्तर पर बच्चों के लिए पृथक स्कूल कायम करना संघ का मुख्य शैक्षिक कार्यकलाप है।
संघ का दूसरा कार्य कल्याणकारी गतिविधियां थीं। संघ का अस्पृश्यों को चिकित्सा सहायता पहुंचाने का कार्य इसी शीर्षक के अन्तर्गत आता है। संघ के वे भ्रमण करने वाले कर्मचारी हरिजनों के घरों में बीमारों और आपदाओं में फंसे लोगें को चिकित्सा सहायता पहुंचाने जाते हैं। अस्पृश्यों के उपयोग हेतु संघ की ओर से कुछ औषधालयों का प्रबंध किया जाता है। यह संघ का लघुतर कार्य है।
संघ का अधिक महत्वपूर्ण कार्य हरिजनों के लिए पेय जल सप्लाई करना है। वह यह कार्य (1) नए कुएं खुदवाकर अथवा नलकूप और पंप लगवाकर, (2) पुराने
- हरिजन, अगस्त 3, 1934