140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कुओं, नलकूपों, पंपों की मरम्मत कराकर और (3) स्थानीय निकायों को नए कुएं
खुदवाने के लिए प्रोत्साहन देकर करता है।
संघ ने तीसरा काम आर्थिक क्षेत्र में किया। संघ ने कुछ औद्योगिक स्कूल चलाए हैं और यह दावा किया जाता है कि संघ द्वारा संचालित स्कूलों से कुछ संख्या में प्रशिक्षित कारीगर निकले जो स्वतंत्र रूप से अपना जीविकोपार्जन कर सकते हैं। परंतु रिपोर्टों के अनुसार अधिक सफल और महत्वपूर्ण कार्य अस्पृश्यों में सहकारी समितियां स्थापित करके किया गया है।
II
संघ की गतिविधियों के इस संक्षिप्त विवरण से दिमाग में यह बात आती है कि संघ अस्पृश्यों के कल्याण के लिए बहुत बड़ी धनराशि खर्च कर रहा है। परंतु वास्तविकता क्या है? यह स्मरण होगा कि अस्पृश्यों की उन्नति के लिए 6 लाख रुपए संघ से प्रतिवर्ष खर्च करने की अपेक्षा की जाती थी, लेकिन संघ ने वास्तव में कितना
खर्च किया? उसके सचिव ने मई 1941 की अपनी रिपोर्टऽ में बताया कि -
फ्आठ वर्षों में संघ ने हरिजनों के लिए अपनी विभिन्न शाखाओं और केंद्रीय
कार्यालय के माध्यम से क्रमशः लगभग 24,25,700 रुपए तथा 3,41,607
रुपए खर्च किए। समस्या की आवश्यकताओं को देखते हुए यह 27,67,307
रुपए की धनराशि अपर्याप्त हैं।य्
इस आधार पर संघ का वार्षिक व्यय 3,45,888 रुपए आता है, जो संघ की अपेक्षित धनराशि से 50 प्रतिशत कम था। इससे स्पष्ट है कि संघ उतना बड़ा कार्य नहीं कर रहा है, जितना संघ के लोग प्रचार करते हैं। संघ बड़ी नाजुक स्थिति में चल रहा है। पांच करोड़ अस्पृश्यों की आबादी पर तीन लाख रुपए का वार्षिक बजट उतना नहीं है, जितने से अछूतों की आवश्यकताएं पूरी की जा सकें। इससे और भी स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न प्रांतों में कांग्रेस के शासन होने के बावजूद दो वर्षों में संघ को यथोचित अनुदान सरकार की ओर से न मिल सका।
संघ को उसकी दयनीय आर्थिक स्थिति के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सारा दोष हिंदुओं का है। यदि संघ की ”ासोन्मुख न होकर जैसी की तैसी स्थिति भी रही तो भी यह स्पष्ट है कि हिंदुओं में अस्पृश्यों के कल्याण के प्रति कितनी उपेक्षा है। राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने एक करोड़ रुपए चंदा एकत्र किया, जो तिलक स्वराज्य कोष में गया। सामान्य हितों के लिए अभी उन्होंने जल्दी ही एक करोड़ पन्द्रह लाख रुपए चंदे के रूप में एकत्र किए, जिससे कस्तूरबा स्मारक कोष
ऽ रिपोर्ट, पृष्ठ 58