174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उसकी मात्रा विशाल थी। कांग्रेस के टिकट पर खड़े होने वाले उन सभी उम्मीदवारों पर कांग्रेस ने बेतहाशा धन खर्च किया। गैर-कांग्रेसी अस्पृश्य उम्मीदवारों को कांग्रेस द्वारा खर्च की गई धनराशि का दस लाखवां भाग भी खर्च करने को उपलब्ध नहीं था। उनमें से कुछ ने तो धन उधार लेकर खर्च किया था। उन्होंने बिना प्रचार की सहायता के विज्ञापनों के अभाव में पैदल घूम-घूम कर चुनाव लड़ा था।
दूसरी बात है कि कांग्रेस पार्टी तंत्र अत्यंत संगठित और मजबूत था जबकि अस्पृश्यों के पास इसका पूर्णतया अभाव था। जैसा कि सभी को मालूम है, पार्टी तंत्र कांग्रेस की वास्तविक शक्ति है। इस प्रकार का पार्टी तंत्र बनाने का श्रेय श्री गांधी को है। यह पिछले बीस वर्षों से अस्तित्व में है तथा सभी स्रोतों के असमान होने से, ऐसी मशीनरी सदैव कार्य करने के लिए तैयार रहती हैं केवल बटन दबाने की देर है। उनका तंत्र इतना व्यापक है कि देश के सभी नगरों और गांवों तक इसकी जड़ें फैली हुई हैं। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां कांग्रेस कार्यकर्ता उस मशीनरी को चलाने के लिए न मिल सकें। जो अस्पृश्य उम्मीदवार कांग्रेस टिकट से खड़े हुए थे, कांग्रेस के पार्टी तंत्र ने उनके चुनाव में खूब काम किया। जो अस्पृश्य कांग्रेस के विरोध में खड़े हुए थे उनकी सहायता के लिए ऐसी कोई पार्टी मशीनरी नहीं थी। पृथक प्रतिनिधित्व की योजना भारतीय राजनीति में सबसे पहले वर्ष 1909 में लागू की गई थी। इसका लाभ उस समय केवल मुस्लिम संप्रदाय को हुआ था। वर्ष 1920 में संविधान का पुनरीक्षण हुआ। उस संविधान संशोधन में वह सुविधा गैर-ब्राह्मण लोगों को भी दी गई। अस्पृश्यों को तब भी उससे वंचित रखा गया। उन्हें विभिन्न प्रांतीय विधान-मंडलों में एक दो सीटों पर नामजद करके आंसू पोंछ दिए गए। 1935 में यह पहला अवसर था कि उन्हें मताधिकार मिला और चुनावों में भागीदारी का अधिकार मिला। इससे स्पष्ट है कि जब अस्पृश्यों को मताधिकार प्राप्त नहीं था, तब उन्हें अपना पार्टी तंत्र बनाने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। इसलिए जब उन्हें कोई चुनाव लड़ना पड़ा तब उनके पास चुनाव के लिए अपनी पार्टी मशीनरी तैयार करने का कोई समय नहीं था। कांग्रेस और अस्पृश्यों की वह लड़ाई ठीक उसी प्रकार की थी जैसे हथियारबंद फौज और निहत्थी भीड़ की लड़ाई।
अस्पृश्यों के सामने चुनाव की कठिनाइयां भी उतनी ही बड़ी थीं। उन सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों में जहां अस्पृश्यों के लिए सुरक्षित सीटों के लिए हिंदू और अस्पृश्य मतदाताओं की मत संख्या समान थी, पहले वहां कठिनाई अनुभव की गई। आगे तालिका में दोनों दलों की मतदान शक्ति दर्शाई गई है।
तालिका से स्पष्ट होता है कि सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र में हिंदू मतदाताओं की संख्या अस्पृश्य मतदाताओं से कितनी बढ़ा दी गई। उस अनुपात की ओर विशेष ध्यान देना