218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वैश्यों के हाथ में खेल रही है, और बम्बई के उन करोड़पतियों का समर्थन
श्री गांधी को प्राप्त है, जो मनचाहा धन उन्हें देते हैं। मैंने उनसे पूछाः ‘यह
कहां तक सत्य है?’
फ्उन्होंने साधारण ढंग से कहाः ‘दुर्भाग्यवश वे सही कहते हैं।’ कांग्रेस
के पास अपना कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। हमने
आरंभ में सोचा था और उसे चालू भी किया कि प्रत्येक कांग्रेस सदस्य से चार
आना वार्षिक चंदा एकत्रित किया जाए। परंतु उससे काम नहीं चला।य्
फ्मैंने उनसे पूछाः ‘कांग्रेस बजट’ के धन का कितना अनुपात अमीर
भारतीयों द्वारा पूरा किया जाता है?य्
फ्उन्होंने उत्तर दिया - ‘संपूर्ण बजट’ इस आश्रम में उदाहरणार्थ जितना
हम खर्च करतं हैं, उससे कम धनराशि में हम गरीबी के साथ गुजर कर
सकते थे। परंतु हम ऐसा नहीं करते और खर्च के लिए सारा धन हमारे
धनवान मित्रों से मिलता है।य्
यही कारण है कि शासक वर्ग की स्थिति से बनिया वर्ग को निकालना ब्राह्मण के लिए असंभव बात है। वास्तव में ब्राह्मणों ने वैश्य वर्ग से केवल कामचलाऊ नहीं, बल्कि हार्दिक संबंध जोड़ रखा है। परिणाम यह है कि आजकल भारत में शासक वर्ग ब्राह्मण-क्षत्रिय गठबंधन के बजाए ब्राह्मण-वैश्य गठबंधन है।
शासक वर्ग का अस्तित्व होना ही सारी कहानी नहीं है। भारत में शासक वर्ग का सदस्य होना ही महत्वपूर्ण बात नहीं है। शास वर्ग के ये सदस्य इस तथ्य से पूर्णतया अवगत और सचेत हैं कि वे शासक वर्ग से संबंधित हैं, केवल वही शासन के अधिकारी हैं। स्वर्गीय श्री तिलक यह कभी नहीं भूल सके कि वह ब्राह्मण हैं और शासक वर्ग के हैं। ठीक यही बात पंडित जवाहरलाल नेहरू ख्1, और उनकी बहन श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित के विषय में कही जाती है।
- श्री पट्टठ्ठमिसीतारमैया ने श्री वाई.जी. कृष्णामूर्ति द्वारा लिखित जवाहरलाल नेहरू के जीवन चरित्र की
भूमिका में लिखा है कि पंडित नेहरू को इस बात पर गर्व है कि वह ब्राह्मण हैं। यह जानकर उन
लोगों को धक्का लगेगा, जो पंडित नेहरू को समाजवादी समझते हैं और जातिपांति में विश्वास नहीं
रखते। श्री पट्टठ्ठमिसीतारमैया को यह पता होना चाहिए कि वह क्या कह रहे हैं? केवल पंडित नेहरू की
इस भावना के नहीं हैं, वरन् उनकी बहन श्रीमती विजय लक्षमी पंडित भी ब्राह्मण होने की भावना से
ओतप्रोत हैं। ऐसा कहा जाता है कि दिसंबर 1940 में दिल्ली में ऑल इंडिया वूमेन्स कांफ्रेंस हुई थी।
उसमें जनगणना में जाति घोषणा न करने के विषय में वार्तालाप हुआ था। श्रीमती पंडित ने इस विचार
को अस्वीकार कर दिया था और कहा था कि उन्हें कोई ऐसा कारण नजर नहीं आता, जिससे कि वह
अपने को ब्राह्मण रक्त होने से गर्व न करें। उन्होंने अपने को ब्राह्मण ही लिखवाया था।
सेंस एंड नानसेंस इन पॉलिटिक्स शृंखला XII, लेखक-जे.ई. संजना, रास्ता रहबर, 14 जनवरी, 1945।