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विदेशियों से आग्रह

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श्री वल्लभ भाई पटेल कांग्रेस हाई कमान के अग्रिम पंक्ति के सदस्य हैं। वे केवल इसी भावना से ओत-प्रोत नहीं हैं कि वे शासन वर्ग से संबंधित हैं, वरन् उनमें से कुछ लोग इस विचार के हैं कि छोटी जातियों के लोग तिरस्कार करने योग्य हैं और उन्हें दास बने रहना चाहिए और कभी शासन करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। वास्तव में उन्हें सर्वसाधारण में ऐसे विचार प्रकट करने में किसी प्रकार की लज्जा और पश्चाताप नहीं प्रतीत हुआ। 1918 में जब गैर-ब्राह्मण लोगों का पिछड़े वर्ग के लोगों ने विद्यमान सभाओं में अपने पृथक प्रतिनिधित्व के लिए आंदोलन आरंभ किया, तो श्री तिलक ने शोलापुर में हुई जन सभा में कहा कि फ्मैं नहीं समझता कि तेल निकालने वाले तेली, तमोली, धोबी इत्यादि गैर-ब्राह्मण और पिछड़े वर्ग के लोग विधान सभाओं में क्यों जाना चाहते हैं?य् श्री तिलक के विचार से उस वर्गों का कार्य है, आदेशों और कानूनों को मानना, कानून बनाने की कामना करना नहीं। वर्ष 1942 में लॉर्ड लिननिथगो ने विभिन्न वर्गों के 52 गणमान्य भारतीय प्रतिनिधियों को इस बात पर विचार करने के लिए आमंत्रित किया कि उस समय युद्ध के अवसर पर भारत सरकार को सहानुभूतिपूर्वक सहयोग देने के लिए कदम उठाए जाने के संबंध में उनकी क्या राय है? उन आमंत्रित व्यक्तियों में अनुसूचित जातियों के भी सदस्य थे। श्री वल्लभ भाई पटेल को वायसराय का यह विचार पसंद नहीं आया कि छोटी जातियों की ऐसी भीड़ आमंत्रित की जाए। उस घटना के तुरंत बाद श्री वल्लभाई पटेल ने अहमदाबाद में हुई जनसभा में कहा ख्1, - वायसराय ने हिंदू महासभा के नेताओं को आमंत्रित किया, मुस्लिम लीग के नेताओं को बुलाया और अन्य लोगों को आमंत्रित किया।य्

यद्यपि श्री पटेल ने अपनी ईर्ष्यालु और कटाक्ष भाषा में तेलियों और मोचियों का नाम विशेष तौर पर लिया, परंतु उनका भाषण इस बात का संकेत है कि शासक वर्ग तथा कांग्रेस हाई कमान के सदस्य इस देश के दलित वर्गों के प्रति कैसी भावनाएं रखते थे। कांग्रेस हाई कमान और शासक वर्ग की ऐसी भावनाओं की और भी मिसालें उनके चुनाव प्रचार अभियान में देखी जा सकती हैं। प्रासंगिक रूप से उन घटनाओं का दिग्दर्शन करना आवश्यक है।

1919 में जब से श्री गांधी ने कांग्रेस पर कब्जा जमाया, ब्रिटिश सरकार से स्वराज्य की मांग मनवाने के लिए कांग्रेसियों ने विधान सभाओं का बहिष्कार करना अपना उद्देश्य बनाया। इस नीति के अंतर्गत न केवल चुनाव प्रचार से हाथ खींच लिया, वरन् चुनावों में कांग्रेस टिकट पर उम्मीदवार लड़ाने के विरोध में प्रचार किया। ऐसी नीति के गुणों पर किसी को झगड़ने की आवश्यकता नहीं। परंतु चुनाव में

  1. संजना, सेंस एंड-नानसेंस इन पॉलिटिक्स ।