अस्पृश्य क्या कहते हैं?
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का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, तो मुसलमानों तथा भारतीय ईसाइयों के विषय में भी स्थिति इससे भिन्न नहीं है। मुसलमान तीन वर्गों में विभाजित हैं - (1) सुन्नी, (2) शिया और (3) मोमिन। इसमें प्रत्येक में अनेक जातियां होती हैं, जो आपस में
खानपान तो कर सकते हैं, परंतु शादी-विवाह नहीं। भारतीय ईसाई भी (1) कैथोलिक और (2) प्रोटेस्टेंट में विभाजित हैं। कैथोलिक पुनः छोटे वर्गों (1) सवर्ण ईसाई और (2) अवर्ण ईसाई में विभाजित हैं। दोनों कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में जातियां होती हैं, जिनमें आपस में विवाह संबंध नहीं होते और सवर्ण ईसाई तथा गैर-सवर्ण ईसाइयों में आपस में खानपान नहीं होता और न वे एक ही गिरजे में हो सकते हैं। इससे स्पष्ट है कि श्री गांधी पूना पैक्ट का एक पक्ष होते हुए भी पक्का इरादा किए हुए हैं कि अस्पृश्यों को पृथक अस्तित्व का दर्जा नहीं किया जा सकता और वह कोई भी तर्क प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं, चाहे वह उनके विरोध को न्यायोचित भी न सिद्ध कर सकें।
संक्षेप में जहां तक अस्पृश्यों का प्रश्न है, श्री गांधी संघर्ष के पथ पर आरूढ़ हैं। वह फिर मुसीबत पैदा कर सकते हैं। उन पर विश्वास करने का समय अभी नहीं आया है। अस्पृश्यों की सुरक्षा के लिए सबसे अच्छा मार्ग यही है कि वे श्री गांधी से सावधान रहें।