278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कुछ अस्पृश्य संभवतः इस विचार से प्रभावित हैं कि सारी बातें बीती हुई बातें हैं और श्री गांधी पूना पैक्ट स्वीकार कर लेने के बाद अब अस्पृश्यों की राजनीतिक मांगों का विरोध नहीं कर सकते, क्योंकि पूना पैक्ट में वह भी एक पक्ष है। इस नाते गांधी जी से आशा की जाती है कि वह अस्पृश्यों को भारत के राष्ट्रीय जीवन में एक पृथक तत्व मानेंगे। यह पूरा भ्रम है, क्योंकि इस बात पर विश्वास करने के बहुत से कारण हैं कि पूना पैक्ट के बाद भी श्री गांधी के विचारों में कोई अंतर नहीं आया है और अस्पृश्यों के प्रति उनका वही पुराना ढर्रा है, जैसा कि अस्पृश्यों के राजनीतिक अधिकारों के विषय में पूना पैक्ट से पहले गोलमेज सम्मेलन में था।ऽ ख्1, इसका प्रमाण है कि 1940 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के राष्ट्रीय जीवन में अस्पृश्यों को पृथक अस्तित्व के रूप में घोषित किया और कहा कि भावी संविधान में उनकी भी राय लेना आवश्यक है। इस पर गांधी विरोध करने के लिए मैदान में उतर आए। जब वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने अस्पृश्यों का पृथक अस्तित्व घोषित किया और कहा कि संविधान में उनकी सम्मति आवश्यक है तो श्री गांधी ने कहाःµ
फ्मैंने अनुभव किया कि कांग्रेस द्वारा राजाओं, मुस्लिम लीग और अनुसूचित
जातियों के साथ भी समझौता न किए जाने को वायसराय द्वारा और बाद में
भारत सचिव द्वारा भारत की स्वतंत्रता के अधिकार को अंग्रेजों द्वारा मान्यता
दिए जाने के मार्ग में रुकावट के रूप में पेश किया जाना कांग्रेस और जनता
के प्रति अन्याय था।य्
× × ×
फ्इस विवाद में अस्पृश्यों को सम्मिलित करके ब्रिटिश सरकार के
अयथार्थ प्रस्ताव को और भी अव्यावहारिक बना दिया गया है। वे जानते हैं
कि अस्पृश्यों का कांग्रेस विशेष ध्यान रखती है और कांग्रेस ब्रिटिश सरकार
की अपेक्षा उनके हितों की रक्षा अच्छे ढंग से कर सकती है। इसके अतिरिक्त
अस्पृश्य वर्ग हिंदू समाज की तरह अनेक जातियों में बंटा है और अस्पृश्य
वर्गों की किसी जाति का एक सदस्य सभी अस्पृश्यों का सच्चा प्रतिनिधित्व
नहीं कर सकता।य्
श्री गांधी द्वारा दिया गया तर्क कितना बचकाना है। यह कहा जा सकता है कि श्री गांधी ने वायसराय द्वारा अस्पृश्यों को दिए गए राजनीतिक अधिकारों के विरोध में अपनी हड़बड़ी में अपना बयान देते हुए यह कहना भूल गए कि यदि वर्ग अनेक जातियों में बंटे हुए हैं और किसी एक जाति का सदस्य उन सब जातियों