अध्यायः 11
गांधीवाद
अस्पृश्यों की तबाही
I
भारतीय लोग इधर जबकि भारत के सामाजिक और आर्थिक जीवन के पुनर्निर्माण की बात करने लगे हैं, वे व्यष्टिवाद बनाम समष्टिवाद, पूंजीवाद बनाम समाजवाद, रूढि़वाद बनाम प्रगतिवाद, जैसे वादों पर बात करते हैं परंतु हाल में भारतीय क्षितिज पर एक नए वाद का अभ्युदय हुआ है। इसे गांधीवाद कहते हैं। यह सच है कि श्री गांधी ने निकट भविष्य में गांधीवाद, जैसे किसी प्रकार के वाद के अस्तित्व में आने से इंकार किया है। श्री गांधी का यह इंकार उनकी विनम्रता से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। परन्तु इससे गांधीवाद का अस्तित्व झुठलाया नहीं जा सकता। गांधीवाद पर बहुत सी पुस्तकें लिखी गई हैं, जिनका प्रतिवाद श्री गांधी ने कभी नहीं किया। उस गांधीवाद की ओर भारत के तथा उसके विदेशों के लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है। कुछ लोगों को इसमें इतना विश्वास है कि वे गांधीवाद को मार्क्सवाद का विकल्प मानने तक से नहीं हिचकते।
गांधीवाद के अनुयायी, जिन्होंने पिछले पृष्ठों का अध्ययन किया है, यह तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं कि संभव है कि श्री गांधी ने अस्पृश्यों के लिए उतना काम नहीं किया हो, जितना कि अस्पृश्य उनसे अपेक्षा करते रहे हों, परंतु क्या गांधीवाद से अस्पृश्यों को कोई आशा नहीं करनी चाहिए? गांधीवाद के अनुयायी मुझ पर आरोप लगा सकते हैं कि अस्पृश्यों के विषय में केवल गड़े मुर्दे उखाड़ कर मैं श्री गांधी के यदा कदा उठाए उनके द्वारा निर्धारित सिद्धांतों की अनदेखी करता हूं। मैं यह मानने के लिए तैयार हूं कि कभी-कभी ऐसा होता है कि जो मनुष्य किसी लम्बे सिद्धांत का प्रतिपादन करता है, वह कोई छोटा कदम उठाता है, तो उसे उसके लिए क्षमा किया जा सकता है इस आशा से कि किसी दिन उस सिद्धांत में गतिशीलता आएगी, जिससे उन लोगों की ओर भी ध्यान जाएगा जिनकी उपेक्षा की गई है। गांधीवाद अध्ययन की