282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दृष्टि से अपने आप में काफी रोचक है। परंतु गांधीवाद के विषय में चर्चा करने के बाद श्री गांधी के बारे में विचार करना काफी कठिन काम होगा, इसलिए मैं गांधीवाद और अस्पृश्यों के विषय पर पहले विचार नहीं करूंगा। साथ ही मैं यह भी जानता हूं कि यदि मैं इसकी उपेक्षा करता हूं तो वह दुर्भाग्यपूर्ण होगा, क्योंकि गांधीवादी लोग श्री गांधी पर मेरी व्याख्या को जानते हुए भी यह प्रचार करने से नहीं चूकेंगे कि यदि श्री गांधी अस्पृश्यों की समस्या को हल करने में असफल हो भी गए होंगे तो गांधीवाद में उन समस्याओं का हल मिल जाएगा। यही कारण है कि मैं ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता और मैं गांधीवाद पर ही पहले चर्चा करूंगा।
II
गांधीवाद क्या है? इसका अभिप्राय क्या है? आर्थिक समस्या और समाजवाद के संबंध में उसके क्या सिद्धांत हैं?
आरंभ में यह बतलाना आवश्यक है कि कुछ गांधीवादी लोग गांधीवादी अवधारणा जो पूर्णतया काल्पनिक है के वशीभूत हो गए हैं। इस अवधारणा के अनुससार गांधीवाद का अर्थ है पुनः गांव की ओर लौटना और गांवों को आत्म-निर्भर बनाना। इस अवधारणा से गांधीवाद केवल क्षेत्रवाद बन कर रह जाता है। मुझे विश्वास है कि गांधीवाद न तो बहुत सहज है और न क्षेत्रवाद की तरह सरल ही। गांधीवाद का दायरा क्षेत्रवाद की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत है। क्षेत्रवाद गांधीवाद का बहुत छोटा और महत्वहीन भाग है। इसका सामाजिक-दर्शन है और इसका आर्थिक दर्शनशास्त्र है। गांधीवाद के आर्थिक और सामाजिक-दर्शन की बात को छोड़ देने का अर्थ है, गांधीवाद का झूठा चित्र पेश करना। हम पहले इसकी सही तस्वीर पेश करते हैं।
हम श्री गांधी की सामाजिक समस्या के संबंध में दी गई शिक्षाओं से आरंभ करते हैं। जाति प्रथा पर गांधी जी के विचार, 1921-22 के गुजराती पत्र फ्नवजीवनय् में उन्हीं के द्वारा पुनर्मुद्रित भाग-दो के संपादकीय लेख ख्1, गुजराती में प्रकट होते हैं।
उनके विचारों का अनुवाद उन्हीं के शब्दों में नीचे दिया गया है। श्री गांधी कहते हैं -
(1) मुझे विश्वास है कि हिंदू समाज आज तक इसी कारण जीवित रह
सका है कि वह वर्ण-व्यवस्था पर आधारित है।
- उसका पुनर्मुद्रण फ्गांधी शिक्षाय् नामक शृंखला के खंड 2 में संख्या 18 के रूप में हुआ था।