तुच्छ प्रदर्शन
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को आजाद कर सकता तो आज मैं ऐसा ही कर देता किंतु यह बिल्कुल
असंभव बात है। एक गुलाम को तो सही काम करने की भी आजादी नहीं
होती है।य्
श्री गांधी ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा µ
फ्अब यह चक्र चल गया है और पंचम वर्ण के लोग इसमें भाग लें अथवा
न लें, शेष हिंदू समाज अपनी ही उन्नति में बाधा पहुंचाए बिना उनकी
उपेक्षा नहीं कर सकता। इसलिए पंचम वर्ण की समस्या मुझे उतनी ही प्रिय
है जितना मुझे अपना जीवन।य्
फ्मैं अपना सारा ध्यान राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन पर देकर संतुष्ट हूं।
अतः मैं इस बात से आश्वस्त हूं क्योंकि समग्र जनता में सभी छोटे-छोटे
वर्ग आ जाते हैं।य्
इस प्रकार कांग्रेस ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया कि दूसरे अध्याय का अंत हुआ। इस दुःखद घटना की खेदजनक बात यह है कि इससे यह तथ्य सामने आ गया कि श्री गांधी शाब्दिक इंद्रजाल में फंसाने की कला खूब जानते थे। इस बात पर सन्देह हो सकता है कि क्या श्री गांधी धोखे की दुनिया में रहना पसंद करते हैं परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं कि वह कुछ ऐसे भ्रम पैदा करना पसंद करते हैं जिन्हें वह अपने प्रिय प्रस्ताव के पक्ष में तर्कों के रूप में प्रयोग कर सकें। श्री गांधी ने अस्पृश्यों को उठाने का व्यक्तिगत दायित्व अपने ऊपर न लेने का जो कारण बतलाया है वह उनकी उसी अशोभनीय आदत का श्रेष्ठ प्रमाण है। अस्पृश्यों से यह कहना कि वे हिंदुओं के विरुद्ध कुछ न करें क्योंकि वे उनके सगे संबंधियों के विरुद्ध हो जाएंगे, यह बात तो मानने वाली है परंतु यह मान लेना कि हिंदु अस्पृश्यों को अपने सगे-संबंधी समझते हैं एकदम भ्रामक है। वे अस्पृश्यों के लिए और इन्द्रजाल भी फैलाते हैं। हिंदुओं से यह कहना कि वे अस्पृश्यता निवारण में लग जाएं, अच्छी सलाह है किंतु यह मानकर चलना कि हिंदुओं ने अस्पृश्यों के साथ जो अमानुषिक अत्याचार किए हैं उससे उन्हें इतनी अधिक शर्म महसूस हो रही है कि उन्हें अस्पृश्यता का उन्मूलन करना ही होगा और हिंदू सुधारकों का एक दल केवल अस्पृश्यता निवारण के लिए ही कटिबद्ध है केवल अस्पृश्यों को मूर्ख बनाने के लिए भ्रम फैलाने वाली बात है और संसार को भी बेवकूफ बनाना है। यह दलील तर्कसंगत है कि समष्टि के हित में व्यष्टि का हित भी निहित है और इसलिए हमें व्यष्टि के हित तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। परंतु यह मानना कि अस्पृश्य समुदाय जैसा भाग समग्र हिंदू समाज का एक अंग है अपने आपको धोखा देना ही होगा। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि श्री गांधी द्वारा फैलाए गए इस भ्रमजाल के कारण अस्पृश्यों तथा देश को कितनी दुखांत घटनाओं का सामना करना पड़ा है।