2. तुच्छ प्रदर्शन - Page 57

42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रयत्नों की आवश्यकता है। जहां तक मैं समझता हूं, पंचम वर्ण के लोगों

के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो असहयोग आंदोलन के माध्यम से उन्हें

विजय दिला सके।

इसलिए पंचम वर्ण के लोगों के लिए यही बेहतर है कि वे वर्तमान

सरकार की गुलामी की जंजीरें उखाड़ फेंकने में राष्ट्रीय आंदोलन में खुले

दिल से साथ दें। पंचम वर्ण के लोगों को देखना चाहिए कि वर्तमान बुरी

सरकार के विरुद्ध असहयोग करने के लिए भारत के अन्य वर्गों से पूरा

सहयोग करें।य्

उसी लेख में श्री गांधी ने हिंदुओं से कहा µ

फ्हिंदुओं को समझ लेना चाहिए कि यदि वे सरकार के विरुद्ध पूर्णतः सफल

असहयोग करना चाहते हैं तो उन्हें पंचम वर्ण के लोगें से वैसा ही सद्व्यवहार

करना चाहिए जैसा कि वे मुसलमानों के साथ करते हैं।य्

श्री गांधी ने 29 दिसंबर, 1920 के फ्यंग इंडियाय् में यही चेतावनी फिर दोहराते हुए कहा µ

फ्सरकार से असहयोग का अर्थ है शासितों से सहयोग और यदि हिंदू अस्पृश्यता

के पाप को नहीं मिटाएंगे तो उन्हें सैकड़ों वर्ष बीत जाने पर भी स्वराज नहीं

मिलेगा। अस्पृश्यता का नाम मिटाए बिना स्वराज उतना ही दुर्लभ है जितना

कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना है।य्

अतः श्री गांधी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह यह सुनिश्चित करें कि बारदोली प्रस्ताव में निहित अस्पृश्योत्थान की कांग्रेस की नीति कार्यान्वित की जाए। वास्तविकता यह है कि श्री गांधी ने इसे श्रद्धा की भावना से करने के बजाए अस्पृश्योत्थान के कार्यक्रम में लेशमात्र भी रुचि नहीं दिखाई। यदि उनकी नीयत नेक हाती तो वह दूसरी कमेटी नियुक्त करते। यदि उनकी नीयत नेक होती तो कांग्रेसियों द्वारा की जा रही तिलक स्वराज फंड की संगठित लूट से इस फंड को बचाते और अस्पृश्यों को लाभ पहुंचाने के लिए इस धनराशि को सुरक्षित रख सकते थे। आश्चर्य की बात है कि श्री गांधी ऐसी चुप्पी साधे रहे जैसे कि उस समस्या से उनका कोई संबंध ही न हो। किसी प्रकार का पश्चाताप करने के बजाए श्री गांधी ने अस्पृश्यों की समस्या के प्रति उदासीनता बरतने को उचित ठहराते हुए जिन तर्कों का सहारा लिया उन पर कोई विश्वास नहीं करेगा। ये तर्क अक्तूबर 20, 1920 के फ्यंग इंडियाय् में उपलब्ध हैं µ

फ्अंग्रेजों से अपना कलंक धोने के लिए कहने से पहले क्या स्वयं हमें अपना

कलंक नहीं धोना चाहिए? यह प्रश्न समुचित रूप से उठाया जा सकता है।

यदि कोई गुलाम अपनी गुलामी का फंदा काटे बिना अपने अधीन व्यक्ति