84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मुझे पढ़ने की अनुमति मिली हुई है - मैं देखता हूं कि किसी भी समय सरकार की ओर से फैसले की घोषणा की जा सकती है। पहले मैंने यह सोचा था कि यदि फैसले में दलित वर्गों को पृथक मतदान स्वीकार किया जाता है, तो मैं ऐसे कदम उठाऊंगा, जिससे मेरे विचार को बल मिले। लेकिन मैं सोचता हूं कि ब्रिटिश सरकार को पहले बिना नोटिस दिए ऐसा करना ठीक न होगा। यह स्वाभाविक है कि मेरे बयान को वे अधिक महत्व न दें। मुझे अन्य एतराजों को दुहराने की आवश्यकता नहीं। आपत्ति है तो केवल दलित वर्गों के पृथक मतदान व्यवस्था स्वीकार करने पर। मैं समझता हूं कि मैं भी उनमें से एक होऊंगा। दूसरों की अपेक्षा उनके मामले की बात ही कुछ और है। मैं व्यवस्थापिकाओं में उनके प्रतिनिधित्व के विरुद्ध नहीं हूं, मैं उनके प्रत्येक वयस्क, स्त्री, पुरुष की कोई शैक्षिक या आर्थिक योग्यता निर्धारित किए बिना, जिनका नाम मतदान सूची में उनके मताधिकार के पक्ष में हूं। परंतु मेरा दावा है कि शुद्ध राजनैतिक दृष्टिकोण से कुछ भी समझा जाए, परंतु पृथक मतदान से उनकी जो हानि होगी, उसको समझते हुए यह सोचना होगा कि वे सवर्ण हिंदुओं के बीच कितना फंसे हुए हैं और वे सवर्ण हिंदुओं पर कितने निर्भर हैं। जहां तक हिंदू धर्म का संबंध है, उसके लिए पृथक मतदान समाज के अंगभंग के समान होगा।
फ्मेरे लिए दलित वर्गों का प्रश्न विशेष रूप से नैतिक तथा धार्मिक है। इसका राजनैतिक पहलू भी यद्यपि महत्वपूर्ण है, परंतु वह नैतिक तथा धार्मिक पक्ष के सामने फीका पड़ जाता है।
फ्आप मेरी भावनाओं को समझिए कि मैं अपने बचपन से ही उन वर्गों की दशा पर कितना सोचता रहा हूं। एक बार नहीं, वरन कई बार मैंने अपना सब कुछ उनके लिए दांव पर लगा दिया। मैं शेख्ी नहीं बघारता हूं, क्योंकि मैं अनुभव करता हूं कि सदियों से दलित वर्गों को जितना दबाया गया है और उन पर जो अत्याचार हुए हैं, उनकी क्षतिपूर्ति हिंदुओं के किसी पश्चाताप से नहीं हो सकती। परंतु मैं जानता हूं कि पृथक मतदान न तो पश्चाताप है और न इसमें दलित वर्गों का सदियों पुराना दमन रुकेगा अथवा उससे बचाव का कोई रास्ता निकलेगा।
फ्अतः मैं सरकार को सविनय सूचित करना चाहता हूं कि यदि सरकारी निर्णय में दलित वर्गों को पृथक मतदान स्वीकार किया जाता है, तो मैं आमरण अनशन करूंगा।