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तुच्छ चालें

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समय चुनौती क्यों दी? उत्तर बहुत स्पष्ट है। लोथियन समिति से पहले अस्पृश्यों की जनसंख्या को कोई महत्व नहीं दिया गया था, परंतु गोलमेज सम्मेलन के बाद जब हिंदुओं की आंखें खुली कि अस्पृश्य अपना अलग प्रतिनिधित्व मांग रहे हैं, जिन्हें अब तक हिंदू दबाए बैठे हुए थे, जिनका उपभोग सवर्ण हिंदू बहुत पहले से करतें आ रहे हैं, तब हिंदुओं ने समझा कि अस्पृश्यों के अस्तित्व को स्वीकार करना सवर्ण हिंदुओं के हितों के आड़े आएगा। उन्होंने मर्यादा और सत्य का गला घोंटने में कोई कसर नहीं उठाई और भारत में अस्पृश्यों को नकारने का सरल उपाय खोज लिया। तब उन्होंने निश्चय किया कि अस्पृश्यों की राजनीतिक मांगों को नकारा जाए तथा किसी भी प्रकार के तर्क की गुंजाइश न छोड़ी जाए। यह इस बात का प्रमाण है कि हिंदू कितना षड्यंत्र रच सकते हैं और वह उल्लू सीधा करने के लिए प्रत्येक अथवा परोक्ष रूप में अस्पृश्यों के विरुद्ध सुनियोजित ढंग से क्या-क्या कर सकते हैं।

VII

हम फिर पहली बात पर आते हैं। गोलमेज सम्मेलन से मात खाकर भारत लौटने वालों में श्री गांधी पहले व्यक्ति थे, जहां पर उनके आलोचकों के अतिरिक्त श्री गांधी का कोई अंध भक्त नहीं था। कहा जाता है कि वापसी के समय रोम में उन्होंने अपने बयान में एक संवाददाता से सविनय अवज्ञा आंदोलन फिर से चलाने की धमकी दी थी, जिसके कारण भारत पहुंचते ही उन्हें गिरफतार करके जेल में बंद कर दिया गया था। यद्यपि वह जेल में थे, परंतु उनके मस्तिष्क में स्वराज की अपेक्षा अस्पृश्य ही कुलमुला रहे थे। उन्हें आशंका थी कि उनके प्राणों की बाजी लगाने की धमकी देने के बावजूद कहीं अस्पृश्यों की मांगों को मान न लिया जाए। प्रधानमंत्री को पंच बनाया गया था। उनके निर्णय देने से बहुत पहले ही श्री गांधी ने जेल से ही, मार्च 1932, को तत्कालीन भारत मंत्री सर सैमुअल होर को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अस्पृश्यों की मांगों पर अपना विरोध दोहराया। वह पत्र इस प्रकार था -

फ्प्रिय सर सैमुअल,

गोलमेज सम्मेलन की समाप्ति पर जब अल्पसंख्यकों का दावा प्रस्तुत

किया गया था, तब मैंने जो भाषण दिया था, शायद आपको याद हो, उसमें

मैंने कहा था कि यदि दलितों को पृथक मतदान स्वीकार किया जाता है, तो

मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर उसका विरोध करूंगा। यह भावावेश या

जोश में नहीं कहा गया था। वह मेरा गंभीय बयान था। उसी के अंतर्गत मैंने

आशा की थी कि भारत वापस आते ही दलित वर्गों के पृथक मतदान के

विरुद्ध लोकमत जगाऊंगा। परंतु ऐसा नहीं हो पाया। समाचारपत्रों से जिनको