नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 100

परिशिष्ट 83

बिल्कुल खिलाफ हैं तथा कांग्रेस के पक्ष में हैं। भारत में कोई राजनैतिक पार्टी यदि पागलों की तरह अंग्रेजों का विरोध नहीं करती, तो उसके प्रति उनको कोई दिलचस्पी नहीं होती। वे लोग, जो कांग्रेस में नहीं हैं, गवाह हैं कि वर्ष 1941-42 में भारत आए अमरीकी पत्रकारों को समझाना कितना कठिन था कि कांग्रेस की अकेली पार्टी नहीं है, परन्तु उन्होनें दूसरी पार्टीयों को घास तक नहीं डाली। बहुत बाद में अहसास हुआ, तब उन्होंने या तो कांग्रेस को गलत सिद्धांतों वाली संस्था कह कर निंदा की अथवा भारतीय राजनीति में दिलचस्पी लेना ही बंद कर दिया। उन्होंने भारत की अन्य राजनैतिक पार्टीयों में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई और न कभी उनके विचारों को समझने की चिंता की और अंग्रेज संवाददाताओं का भी यही हाल है। वे भी केवल इस प्रकार की राजनीति में रूचि लेते हैं जो घोर ब्रिटेन विरोधी है। वे उन पार्टियों को नहीं पूछते, जो सुरक्षित लोकतंत्र की हामी हैं। परिणाम यह है कि विदेशी पत्रकार भारतीय राजनीति के संबंध में उसी प्रकार समाचार प्रकाशित करते है, जिस प्रकार के भारतीय अखबार करते है।

पत्रकार हों या न हों, क्या उन प्रगतिशील विचारकों का यह कर्तव्य नहीं हो जाता कि संसार के किसी भी भाग में जहां कहीं सही प्रजातंत्र के लिए लड़ाई लड़ी जा रही हो, तो अपने विचारों के अनुकूल तत्वों को प्रात्साहित करें। उनसे संपर्क कायम रखें और देखें कि सब जगह प्रजातंत्र फैले । दुर्भाग्य की बात है कि अमरीकी और इंगलैंड के प्रगतिशील विचारक उस वर्ग को भूल गए हैं, जिसकी सहायता करना उनका कर्त्तव्य है, इसके बजाए वे भारतीय अनुदारवादियों को प्रोत्साहन दे रहे हैं। जो लोग स्वतंत्रता के नारे का दुरूपयोग करते हैं, वे ऐसा करके अपनी करनी पर पर्दा डालते हैं और संसार को गुमराह करते है।

कांग्रेस द्वारा फैलाया गया यह कोहरा छंट जाएगां और विदेशी अनुभव करने लगेंगे कि भारत में प्रजातंत्र और स्वायत्त शासन, तब तक वास्तव में स्थापित नहीं हो सकता, जब तक कि स्वतंत्रता का लाभ न मिले। परंतु यदि वे कांग्रेस की वास्तविकताओं तथा उसके इरादों की बिना परीक्षा लिए खोखले नारों के आधार पर आंख मूंद कर कांग्रेस का समर्थन करते रहे, तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि वे भारत के मित्र होना तो दूर रहा भारतीय जनता की स्वतंत्रता के लिए वे निश्चित रूप से

खतरा है। यह अफसोस की बात है कि वे उस उत्पीड़क को पहचानने की कोशिश नहीं करते, जो स्वतंत्रता का तर्क इसलिए लेता है कि वह अपने उन अधिकारों को पुनः प्राप्त करना चाहता है, जिससे वह उन दलित वर्गों को और दबा सके, जो उसके दमन से छुटकारा पाना चाहते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति की शीघ्रता में उन्हें यह समझने का अवसर नहीं कि कांग्रेस का पक्ष लेकर वे जो कुछ करना चाहते हैं, उससे भारत