82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उन प्रगतिशील नेताओं की सहायता की आवश्यकता है। परंतु उनकी सहानुभूति एवं समर्थन की वर्षो से प्रतीक्षा अछूतो के लिए व्यर्थ साबित हुई। यूरोप और अमरीका के उन प्रगतिशील एवं वामपंथी नेताओं ने यह जानने की परवाह नहीं की कि कांग्रेस के पीछे कौन शक्ति काम कर रही है।
अनभिज्ञ और लापरवाह व्यक्ति भले ही कांग्रेस की भावना को न जानता हो, परंतु वास्तविकता यह है कि वे वामपंथी और प्रगतशील नेता आंख मूंद कर उस कांग्रेस का समर्थन करते हैं, जो पूंजीपतियों, जमींदारों, सूदखोरों तथा प्रतिक्रियावादियों द्वारा चलाई जा रही है- केवल इसलिए कि कांग्रेस अपने कार्यकलापों द्वारा स्वतंत्रता का गौरान्वित नाम लेकर चिल्ला-चिल्ला कर प्रचार करती हैं। स्वतंत्रता की सभी लड़ाईयां समान नैतिक स्तर की नहीं हुआ करती, क्योंकि इन लड़ाइयों के पीछे स्वतंत्रता की लड़ाई का सदैव एक सा ध्येय नहीं हुआ करता। इग्लैंड के इतिहास से कुछ उदाहरण लीजिए। जॉन के विरूद्ध बेरन का विद्रोह आजादी की लड़ाई कहा जा सकता है, पंरतु क्या कोई लोकतंत्रवादी आज के युग में उसका समर्थन कर सकता है? क्या केवल इसलिए इंगलैंड के किसान विद्रोह का समर्थन किया जा सकता है कि उसे स्वतंत्रता का नाम दे दिया गया था? ऐसा करना स्वतंत्रता के नाम पर उठाई गई झूटी पुकार पर आगे बढ़ने के समान होगा। ऐसा अपरिवक्व व्यवहार क्षम्य होता, यदि वह किसी मंद बुद्धि व्यक्ति द्वारा किया गया होता जिसे यह निर्णय करना न आता हो कि जीने की स्वतंत्रता और दमन करने की स्वतंत्रता में क्या भेद है। परंतु सर्वश्री लास्की, किंग्सले मार्टिन, बेल्सफोर्ड लुईफिशर जैसे लब्धप्रतिष्ठित प्रजातंत्र संरक्षकों के प्रगतशील वामपंथी अनुयाइयों को इसके लिए क्षमा नहीं किया जा सकता।
जब उनसे यह प्रश्न पुछा जाता है कि वे वास्तविक प्रजातंत्र के लिए लड़ने वाली पार्टियों का समर्थन क्यों नहीं करते, तो वे पलट कर प्रश्न करते हैं कि क्या भारत में अन्य ऐसी पार्टीयां हैं, जो वास्तविक प्रजातंत्र के लिए लड़ रही है? यदि ऐसी पार्टियां है तो अखबार वाले उनके कार्यकलाप क्यों नहीं प्रकाशित करते? जब कहा जाता है कि प्रेस कांग्रसी है, तब पुनः प्रश्न उठता है कि विदेशी अंग्रेजी अखबार वाले क्यों नहीं प्रकाशित करते? मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि विदेशी अखबार वालों से कोई आशा नहीं की जा सकती । भारत में जो विदेशी समाचार एजेंसियां हैं, वे भारतीय समाचार एजेंसियों से अधिक अच्छी नहीं कही जा सकती। वास्तव में वे अधिक अच्छी एजेंसिया हो नहीं सकतीं । भारत में जो विदेशी पत्रकार हैं वे अधिकतर भारतीय है और विदेशी बहुत कम। विदेशी पत्रकारों के रूप में ऐसे भारतीयों का चुनाव किया जाता है, जो अधिकतर कांग्रेस के पिट्ठू होते है। ये विदेशी पत्रकार जो विदेशी ही हाते है, दो प्रकार के होते हैं। यदि अमरीकी हैं तो अंग्रेजो के