अध्याय-1
अछूतों की कुल जनसंख्या
भारत में किसी समय जनगणना एक सरल और सहज प्रक्रिया हुआ करती थी, जिसमें केवल जनसंख्याविदों को ही रूचि रहती थी। बाकी किसी को इसमें दिलचस्पी नहीं होती थी। आज गणना पर अत्यधिक ध्यान दिया जा रहा है। सिर्फ राजनीतिज्ञ को ही नहीं, बल्कि जन सामान्य को भी चिंता रहती है। इसका कारण यही है कि भारत की राजनीति आज संख्या का खेल बन गई है। संख्या ही वह तत्व है, जो एक समुदाय को दूसरे से अधिक राजनैतिक महत्व देती है। ऐसा दुनिया के किसी और देश में नहीं होता। इसी का परिणाम है कि जनगणना में इस प्रकार की गड़बड़ी की जाती है, जिससे कि संख्या के आधार पर राजनीतिक लाभ बटोरा जा सके। जनसंख्या की इसी गड़बड़ी में हिन्दू, मुसलमान और सिख ने अपनी-अपनी भूमिका रसोईघर के मुख्य रसोइये की निभाई है। इसी में अछूत और ईसाई भी रुचि ले रहे है जिनका जनगणना की कारीगरी में कोई हाथ नहीं है, क्योंकि देश के प्रशासन में उनका कोई स्थान नहीं है जो जनगणना का काम देखता है, बल्कि इसके विपरीत हिंदू, मुसलमान और सिख अछूतों के समूह को जनगणना के आधार पर काट-छांट कर अपने साथ गिन रहे हैं। 1940 की जनसंख्या में खास तौर पर ऐसा हुआ। पंजाब के कुछ विशेष भागों में सिखों ने अछूतों को योजनाबद्ध तरीके से डराया, धमकाया और सताया। उनका इरादा था कि अछूतों को विवश किया जाए कि वे सिख न होते हुए भी जनसंख्या में अपने को सिख लिखवाएं। इससे अछूतों की जनसंख्या सिकुड़ गई और सिखों की बढ़ गई। हिंदुओं ने अलग से एक अभियान चलाया कि जनगणना में कोई अपनी जाति न लिखवाए। अछूतों से एक खास अपील कि गई। उन्होंने बताया कि जाति का नाम ही यह प्रकट करता है कि वे अछूत हैं और यदि वे अपनी जाति का उल्लेख न करके केवल यही लिखवाएं कि वे हिंदू हैं, तो उनके साथ अन्य हिन्दूओं की तरह बर्ताव किया जाएगा और किसी को यह पता भी नहीं चलेगा कि वे अछूत हैं। अछूत इस झांसे में आ गए ओर उन्होंने निश्चय किया कि