2. अछूतों का महत्व - Page 20

अध्याय-2

अछूतों का महत्व

संसार में अधिकांश देशों में ऐसे वर्ग हैं जो निम्न वर्ग कहे जाते हैं। ये रोम में स्लेव या दास कहलाते थे। स्पार्टन में इनका नाम हेलोटस या क्रीत था। ब्रिटेन में ये विलियन्स या श्रुद्र कहलाते थे, अमरीका में नीग्रो और जर्मनी में ये यहूदी थे। हिंदुओं में यही दशा अछूतों की थी, परन्तु इनमें से कोई इतना बदनसीब नहीं था, जितना अभागा अछूत दास, क्रीत श्रुद्र सभी लुप्त हो गए हैं। परंतु छुआछुत का भूत आज भी मौजूद है और यह तब तक मौजूद रहेगा जब तक हिंदू धर्म का अस्तित्व है। अछूत यहूदियों से भी गया-बीता है। यहूदियों की दुर्दशा उनकी अपनी करनी के कारण है। अछूतों की दुर्गति के कारण नितांत भिन्न है। यह निर्मम हिंदुओं की साजिश के शिकार है, जो उनकी दुर्दशा के लिए बर्बर तत्वों से कम नहीं है। यहूदी तिरस्कृत हैं, परन्तु उनकी तरक्की के रास्ते बंद नहीं कर दिए गए हैं। अछूत केवल तिरस्कृत ही नहीं है, बल्कि उनकी तरक्की के सभी दरवाजे बंद हैं। फिर भी अछूतों की तरह किसी का ध्यान नहीं गया 6 करोड़ प्राणियों की अनदेखी हो रही है।

भारत में आजादी का जो कोलाहल मचा है, उसमें यदि कोई वस्तु है तो वह है अछूतों का हेतु। हिंदुओं और मुसलमानों की लालसा स्वाधीनता की आकांक्षा नहीं है। यह तो सत्ता संघर्ष है, जिसे स्वतंत्रता बताया जा रहा है। इसी कारण मुझे इस बात पर आश्चर्य है कि किसी दल अथवा किसी संगठन ने अपने आप को अछूतों के प्रति समर्पित नहीं किया। अमरीका साप्ताहिक ‘‘द नेशन’’ और इंगलैड के साप्ताहिक ‘‘स्टेट्समैन’’ प्रभावशाली अखबार हैं। दोनों ही भारतीय स्वतंत्रता के पक्षधर हैं और ये भारत की स्वतंत्रता का दम भरते हैं। जहां तक मैं जानता हूं, अछूतों की समस्याओं को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कहती है। अन्य हिंदू और कोई अन्य नहीं जानता कि वास्तव में अछूत क्या है। भारत में हिंदुओं के सिवाय सब जानते हैं कि नाम भी कुछ क्यों न रख लिया हो, यह संदेहातीत है कि यह मध्यमवर्गीय हिंदुओं की संस्था है, जिसको हिंदु पूंजीपतियों का समर्थन प्राप्त है, जिसका लक्ष्य भारतीयों