अध्याय-3
अछूतों की राजनीतिक मांगें
अछूतों की समस्याएं अनेक हैं। वास्तव में कुछ समय से मैं इन समस्याओं पर विचार करने में व्यस्त हूं, जो सैकड़ों पृष्ठों में लिखी जानी हैं। इस प्रबंध लेख की परिधि में मैं यह नहीं कर सकता हूं कि संक्षेप में इस समस्या के लक्षण बताऊं और इस समाधान की ओर संकेत कर संकू, जो अछूतों ने स्वयं सोचे विचारें हैं। मुझे लगता है कि इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता कि मैं निम्नांकित प्रस्तावों की ओर आपका ध्यान दिलाऊं जो अखिल भारतीय परिगणित जाति संघऽ ने 18 और 19 जुलाई 1942 में अपने नागपुर अधिवेशन में पारित किए।
प्रस्ताव संख्या-2
संविधान पर सहमति आवश्यक
‘‘सह सम्मेलन घोषित करता है कि परिगणित जातियों को कोई भी नया संविधान स्वीकार्य नहीं होगा, जब तक
(1) इस पर अनुसूचित जातियों की सहमति हो,
(2) उसमें यह बात स्वीकार की जाए कि अनुसूचित जातियों की स्थिति
हिंदुओं से विशिष्ट तथा भिन्न है और भारतीय समाज में वे एक
महत्वपूर्ण अंग हैं, और
(3) इसी में उन प्रावधानों का उल्लेख हो कि नए संविधान में अनुसूचित
जातियों में सुरक्षा की भावना पैदा हो और जो निम्नांकित प्रस्तावों में
समाविष्ट हैं।
ऽ 1935 के गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट में अछूतों को अनुसूचित जातियां कहा गया है।