अध्याय-6
कार्यपालिका
अछूतों की दूसरी राजनीतिक मांग है कि उन्हें न केवल व्यवस्थापिका में प्रतिनिधित्व दिया जाए, बल्कि उनका कार्यपालिका में भी प्रतिनिधित्व हो। हिंदुओं ने इस मांग का भी विरोध किया। हिन्दुओं के तर्क दो प्रकार के हैं। पहला यह कि कार्यपालिका में व्यवस्थापिका के बहुमत का प्रनिधित्व हो और दूसरा यह कि कार्यपालिका का सदस्य सक्षम हो। पहले मैं दूसरे तर्क को लेता हूं। यह एक ऐसा तर्क है, जो बुनियादी तौर पर वजनदार है। परंतु इस बात पर भी अहसास होना चाहिए कि प्रतिनिधि सरकार में ऐसा तर्क नहीं चलता क्योंकि प्रोफेसर डिके का तर्क है - ‘‘सवैधानिक व्यवस्था का यह प्राथमिक उद्देश्य नहीं है कि संसद बौद्धिकता की दृष्टि से श्रेष्ठतम हो। दरअसल यह प्रतिनिधि सरकार के सिद्धांत के प्रतिकूल होगा कि किसी देश की जनता के बजाए संसद अत्यधिक बुद्धिजीवियों का ही प्रतिनिधित्व करें।
सक्षमता पर जोर देना आवश्यक है। किसी ने यह नहीं कहा कि केवल अछूत होने के नाते किसी को मंत्री बना दिया जाए। यदि अछूतों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया जाए, तो निस्संदेह वे अपने में से अति सक्षम लोगों को चुनेंगे। प्रत्येक प्रांत में ऐसे अनेक लोग उनमें है जो इन पदों पर काम कर सकें। फिर यह बात केवल अछूतों तक ही क्यों सीमित रहे? अछूतों की तरह मुसलमान भी दावा कर रहे हैं कि मंत्रीमंडल में स्थान दिया जाए। हिंदू यह शर्त मुसलमानों पर क्यों लागू नहीं कर रहे हो? इससे पता चलता है कि हिंदुओं की आपत्ति तर्क पर आधारित नहीं है। यह एक बहाना है।
हिंदुओं का अन्य तर्क बहुमत और अल्पमत शब्दों का दुरुपयोग है। लगता है। वे भूल गए हैं कि बहुमत और अल्पमत राजनीतिक शब्दाबली है। राजनीतिक दृष्टि से न तो कोई स्थाई बहुमत होता है और न अल्पमत। राजनीतिक बहुमत और राजनीतिक अल्पमत बदलते रहते हैं। आज जो बहुमत है कल वह अल्पमत रह जाएगा और आज जो अल्पमत है, वह बहुमत में बदल जाएगा। हिंदुओं और अछूतों में वह स्थिति नहीं