जाति और संविधान 27
अब तक मैंने सामान्य रूप से यह स्पष्ट किया है कि विशिष्ट प्रकृति वाले हिंदू समाज के लिए एक विशिष्ट प्रकृति को राजनीतिक व्यवस्था की क्यों आवश्यकता है और भारत के संविधान-निर्माता इन समस्याओं को अनदेखी क्यों नहीं कर सकते, जैसी समस्याएँ अन्य देशों के संविधान में सांप्रदायिक योजना को शामिल करना क्यों आवश्यक है और अछूतों के लिए सरकारी सेवाओं में स्थान क्यों आरक्षित किए जाएं और उनके लिए पृथक अवसर क्यों आवश्यक हैं। इन मांगों का औचित्य सहज और स्वाभाविक है। यह बात इस निर्विवाद तथ्य से उत्पन्न होती है कि इसी कारण हिंदुओं से अछूतों को अलग कर दिया गया है और वह भेदभाव अनावश्यक है। यह जन्मजात कटुता और तिरस्कार का मामला है। इस तिरस्कार और कटुता के लिए किसी साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है। चिरंतन अस्पृश्यता का व्यवहार हिंदुओं और अछूतों के बीच कटुता का पर्याप्त साक्ष्य है। ऐसी कटुता देखते हुए यह असंभव है कि अछूतों से कहा जाए कि वे इस बात पर विश्वास कर लें कि अंग्रेजों और स्वाधीनता मिलने के बाद हिंदू उनके साथ न्याय करेंगे। जब अछूत यह कहते हैं कि वे हिंदुओं पर विश्वास नहीं करते तो कौन कह सकता है कि यह कोई गलत कथन नहीं है। हिन्दू उनके लिए उतना ही पराया है, जितना कोई यूरोपवासी बल्कि उससे भी बदतर बात तो यह है कि यूरोप वाले पराए होकर तटस्थ तो हैं हिंदू तो निर्लज्जता से अपने वर्ग का पक्ष-पोषक है और अछूतों के प्रति दंभ रखता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि युगों-युगों से हिंदुओं ने अछूतों को तिरस्कृत और अपमानित किया है, क्योंकि वह एक अलग और घृणित वर्ग का है बेशक वह दूसरी नस्ल का न भी हो। अपनी मान्यताओं के अनुरूप हिंदू अपने को अतिविशिष्ट वर्ग मानता है। वह अपने पूर्वाग्रहों के कारण अछूतों की आकांक्षाओं का कभी ध्यान नहीं रखता। उनसे वह कोई संबंध नहीं रखना चाहता और वह उनके हितों का विरोधी है। ऐसे लोगों के साथ अछूत क्यों बंधे रहें? अछूतों से यह कैसे कहा जा सकता है कि वे अपने हित ऐसे लोगों के हाथों में सौंप दें जो पूरी तरह उनके हितों और आंकाक्षाओं के विरोधी हैं, जो अछूतों की जीवंतता के प्रति सहानुभूति नहीं रखते, जिनकी उनके प्रति रूचि और मनोभावना नहीं है, जो उनकी अपेक्षाओं से खार खाते हैं, वे निश्चिंत रूप से उनके साथ न्याय नहीं करेंगे। उनसे भेद-भाव बरतेंगे और वे आज तक अपने धर्मादेशों के अनुसार अछूतों के विरूद्ध दुर्व्यवहार के प्रति लहजा महसूस नहीं करते बल्कि कदम कदम पर अमानवीय बर्ताव करते हैं। ऐसे लोगों से सुरक्षा का एक ही उपाय है। राजनीतिक अधिकार-जिनकी मांग है कि अछूतों को हिंदू बहुसंख्यकों के अत्याचारों से बचने के लिए संविधान में स्पष्ट व्याख्या की जाए। क्या सुरक्षा की ये मांग बेतुकी है?