26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाति को दूसरी जाति से भिन्न माना जाता है। दूसरे समाजों की व्यवस्था में विभाजन गुणात्मक है। वर्ग प्रणाली में भी भिन्नता का स्थान है किंतु वह किसी वर्ग के कार्यों को जन्म-जन्मांतर के लिए तय करने के लिए नहीं है और न ही उसमें सामाजिक मेल-मिलाप पर कोई प्रतिबंध होता है। वर्ग व्यवस्था श्रेणियों के सही विभाजन की व्यवस्था श्रेणी में वर्गों का सामाजिक रूप से विभाजन नहीं होता जबकि जाति प्रथा में भिन्न-भिन्न जातियों के बीच निर्धारित परस्पर संबंधा निश्चित रूप से अनिवार्य और अविनाशी होते हैं, जो पक्के तौर पर असमाजिक हैं। यदि वह विश्लेषण सही है, तो तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हिंदू समाज व्यवस्था का स्वरूप भिन्न है, तो इसका परिणाम यही होगा कि हमारा राजनीतिक स्वरूप भिन्न होना चाहिए। अछूतों की कामना यही है, उसे सीधे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि साधन और साध्य में समन्वय होना चाहिए कि साध्य एक ही होना चाहिए। यदि साध्य एक भी तो तो यह आवश्यक नहीं कि उसे प्राप्त करने के साधन भी समान होंगे। दरअसल साध्य एक ही होने पर भी काल और परिस्थिति के अनुकूल साधनों में भिन्नता भी हो सकती है। जिसके साध्य शुभ हैं और वे चाहते हैं कि उसका साध्य फूहड़ न कहलाए तो उन्हें दूसरे साधन अपनाने होंगे।
इस संबंधा में एक और बात का उल्लेख करना चाहूंगा। जैसा कि मैंने कहा, हिन्दुओं की जाति व्यवस्था को देखते हुए यह आवश्यक है कि यहां कि राजनीतिक व्यवस्था भिन्न होनी चाहिए और वह सामाजिक ढांचे के अनुरूप निर्धारित हो। बहुत से लोग इसे स्वीकार करते हैं परंतु तर्क देते हैं कि हिंदू समाज में जातियां तोड़ी जा सकती है। मैं इस बात को स्वीकार नहीं करता। जो यह कहते हैं वे सोचते हैं कि जाति कोई ऐसी संस्था है जैसे क्लब, नगरपालिका या काउंटी कौंसिल_ यह एक बड़ी भूल है। जाति धर्म और धर्म संस्था के सिवाय कुछ भी हो सकता है। यह संस्थाकृत है परंतु जैसी इसकी रचना है, उसके परिप्रेक्ष्य में ऐसी कोई संस्था नहीं है। धर्म एक प्रवाह या ऐसी शक्ति है, जो हर व्यक्ति में रचा बसा है और व्यक्ति के चरित्र को प्रभावित करता है और उसके कार्य, व्यवहार और पंसद-नापंसद को निर्धारित करता है। ये पसंद-नापसंद, कार्य, व्यवहार ऐसी संस्था नहीं हो सकते, जिन पर कोई और रंग चढ़ सके। सीधे शब्दों में यह ‘‘काली कमली’’ है। यह ऐसी शक्ति है, ऐसा प्रवाह है, जिसे नियंत्रित करने के लिए उसकी काट भी होनी चाहिए। यदि सामाजिक राजनीति में घालमेल है ओर मुट्ठी भर लोगों के वर्चस्व पर नियंत्रण रखना है, बहुत से लोगों को हेयता की पीड़ा से बचाना है, तो यह आवश्यक है कि राजनीतिक संरचना ऐसी हो जो सामाजिक तत्वों के संभावित पूर्वाग्रहों को लगाम दे सकें, अन्याय को रोक सके।