नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 67

50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दूसरे परीक्षण से भी ऐसा ही निष्कर्ष निकलता है। उदाहरण के लिए मद्रास प्रेसीडेंसी को लीजिए। अगले पृष्ठ पर तालिका संख्या 1 का अवलोकन कर विचार करें। उससे स्पष्ट है कि वर्ष 1943 में राजपत्रित पद ब्राह्मणों तथा अन्य समुदायों में किस प्रकार बांटे गए थे। इसी प्रकार के आंकड़े इस कथन की पुष्टी में अन्य प्रांतों से भी प्रमाण के तौर पर दिए जा सकते हैं। परंतु उसके लिए परिश्रम करने की कोई आवश्यकता नहीं। ब्राह्मण अपने आपको शासक जाति का सदस्य होने का दावा करते हैं या नहीं, वास्तविकता यह है कि प्रशासन पर उन्हीं का नियंत्रण है और शासित जातियां उनके ब्राह्मणत्व को स्वीकारती है। यह प्रमाण काफी है ।

दरसल यह संभव नहीं कि ब्राह्मण किसी अन्य वर्ग को अपने साथ जोड़े बिना अपनी शासकीय श्रेष्टता का पद बनाता क्योंकि उनकी जनसंख्या बहुत कम है।

इतिहास से स्पष्ट है कि ब्राह्मण सदैव उन्हीं दूसरे वर्गो को अपने से सम्बद्ध करते रहे हैं जिन्हें वे शासक जातियों के समान स्तर देने को तैयार होते थे।

ऽ दूसरे यात्री ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि यह प्रथा काफी व्यापक थी। ईस्ट इंडीज पर अपने

विवरण में हेमिल्टन लिखता हैः- जब राजा नव-विवाहिता पत्नी लाता है तो अपनी पत्नी के साथ तब

तक सहवास नहीं कर सकता जब तक कि नम्बूदरी अथवा धर्म प्रमुख ब्राह्मण उसके साथ सहवास

न कर ले और यदि वह ब्राह्मण चाहे, तो उसके साथ तीन रातें और सहवास कर सकता है, क्योकि

उस विवाहिता पत्नी के वैवाहिक संस्कार का पहला प्रसाद इस पवित्र देवता(ब्रह्मण) को भेंट किया

जाना चाहिए जिसकी वह पूजा करती है और उसे कुछ सामंत भी ऐसे होते हैं जो नम्बूदरी को यह

प्रसाद चखाते हैं परंतु जनसाधारण को यह विशेष अधिकार नहीं हैं बल्कि पुरोहित के बजाए खुद यह

प्रसाद चखते है।य्

(खंड 1, पृष्ठ 308)

बुचनान ने अपने यात्रा वृत्त में लिखा है कि तामरी परिवार की पत्नियों को सामान्यता नम्बूदरी ब्राह्मणों द्वारा गर्भधारण कराया जाता था। यदि वे चाहें तो नायर लोगों से भी करा सकती हैं परंतु नम्बूदरी ब्राह्मण से गर्भित होना पवित्र कार्य समझती हैं।

- पिकरटने वायज खंड 8 पृष्ठ 734

मि.सी.ए.अन्नेस.आई.सी.एस. जी मालाबार और अंग्रेजों के गजेटियर के संपादक थे उन्होंने मद्रास सरकार के अधिकारी की हैसियत से लिखा हैः-

फ्मरूक्काटायम प्रथा को पालने की प्रथा अधिकारी वर्गो में प्रचलित है जो मालयाली विवाह पद्धति में प्रचलित अजीबोगरीब प्रथा है। उस प्रथा का सार यह है कि लड़की को उसके गले में रजस्वला होने की आयु से पहले सोने अथवा अन्य धातु की बनी हुई ताली (लाकेट) बांध दी जाती थी। ताली उसकी अथवा उससे ऊंची जाति का व्यक्ति बांधता था। वह उस से संबंध स्थापित कर सकती थी। सामान्यतया यही होता था कि ताली बांधने वाला व्यक्ति उसका दूल्हा बनता था और वही उससे सहवास करने का अधिकारी था और यह कृत्य भूदेव करते थे। इससे निचले स्तर के लोगों का ऐसा विवाह संपादन क्षत्रिय अथवा शासक जातियों के लोग करते थे तथा अपने से निम्न जाति की स्त्री का प्रथम फल प्राप्त करते थे।य्

- खंड, 1 पृष्ठ 101